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इसरो का बड़ा एलान : अब आम नागरिक भी छू सकेंगे आसमान, गगनयान के बाद खुलेगा अंतरिक्ष का द्वार

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब एक बड़े बदलाव के दौर में है। Indian Space Research Organisation (ISRO) अपने Gaganyaan मिशन के अगले चरणों में आम नागरिकों—खासतौर पर STEM (Science, Technology, Engineering, Maths) विशेषज्ञों—को भी अंतरिक्ष यात्री बनने का मौका देने की योजना बना रहा है। दूसरे बैच में करीब 10 अंतरिक्ष यात्री चुने जा सकते हैं, जिनमें 6 सैन्य पृष्ठभूमि से और 4 नागरिक होंगे। यह बदलाव इसलिए किया जा रहा है ताकि भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों में वैज्ञानिक शोध और प्रयोगों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 27 Apr 2026, 03:17 PM · अपडेट: 06 May 2026, 05:35 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

भारत का अंतरिक्ष सपना अब केवल वायुसेना के जांबाज पायलटों तक सीमित नहीं रहेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन के शुरुआती चरणों की सफलता के बाद, अंतरिक्ष यात्री कैडर के दरवाजे देश के आम नागरिकों के लिए खोलने की तैयारी कर रहा है। यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक युगांतकारी बदलाव होगा, जहाँ विज्ञान और तकनीक के विशेषज्ञों को भी सितारों के पार जाने का मौका मिलेगा।

अगले बैच में दिखेगी विविधता: STEM विशेषज्ञों की एंट्री

गगनयान के पहले मिशन के लिए चुने गए सभी चार अंतरिक्ष यात्री भारतीय वायुसेना के अनुभवी टेस्ट पायलट हैं। लेकिन इसरो की भविष्य की योजना काफी अलग और समावेशी है। सूत्रों के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रियों के दूसरे बैच में विविधता पर विशेष जोर दिया जाएगा।

  • कुल पद: दूसरे बैच के लिए 10 अंतरिक्ष यात्रियों का चयन किया जा सकता है।

  • सैन्य और नागरिक का तालमेल: इसमें 6 यात्री वायुसेना की पृष्ठभूमि से होंगे, जबकि 4 यात्री नागरिक (Civilians) होंगे।

  • STEM पर फोकस: ये नागरिक चयन मुख्य रूप से विज्ञान (Science), टेक्नोलॉजी (Technology), इंजीनियरिंग (Engineering) और गणित (Maths) यानी STEM बैकग्राउंड से जुड़े विशेषज्ञों के लिए होंगे।

मिशन का भविष्य और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन

इसरो की योजना केवल नागरिकों को भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अंतरिक्ष में भारत की स्थायी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है। इसके लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया है:

  1. मिशन की आवृत्ति: योजना के अनुसार, हर साल दो मानवयुक्त मिशन भेजने का लक्ष्य है। एक बार अंतरिक्ष से लौटने के बाद, यात्री दो साल के अंतराल पर दोबारा उड़ान भर सकेंगे।

  2. ट्रेनिंग चक्र: एक अंतरिक्ष यात्री के चयन से लेकर प्रशिक्षण और मिशन के लिए तैयार होने में लगभग 4.5 साल का समय लगता है।

  3. टीम विस्तार: सातवें मानवयुक्त मिशन से इसरो प्रत्येक दल में यात्रियों की संख्या 2 से बढ़ाकर 3 करने का प्रस्ताव रख रहा है। यह विस्तार भारत के अपने 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, जहाँ प्रयोगों के लिए अधिक वैज्ञानिकों की आवश्यकता होगी।

क्यों पहले पायलट और अब नागरिक?

दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों (जैसे NASA या Roscosmos) का यह इतिहास रहा है कि शुरुआती मिशनों में हमेशा सैन्य पायलटों को प्राथमिकता दी जाती है। इसका मुख्य कारण तकनीकी जटिलता और आपातकालीन स्थितियों में पायलटों का त्वरित निर्णय लेने का कौशल है।

"जब तक तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित और 'रूटीन' नहीं हो जाती, तब तक जोखिम कम करने के लिए सैन्य प्रोफेशनल्स पर भरोसा किया जाता है। एक बार मिशन की गति और तकनीक स्थिर होने पर, नागरिकों और वैज्ञानिकों को शामिल करना अनिवार्य हो जाता है।"

पहले बैच के हीरो

वर्तमान में, देश के पहले मानवयुक्त मिशन की जिम्मेदारी चार दिग्गजों के कंधों पर है:

  • एयर कमोडोर प्रशांत बी. नायर

  • ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला

  • ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन

  • ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप

इन अधिकारियों को उनकी तकनीकी विशेषज्ञता और सुरक्षा मानकों को देखते हुए चुना गया है। लेकिन आने वाले समय में, तीसरे बैच तक पहुँचते-पहुँचते सैन्य और नागरिक अंतरिक्ष यात्रियों का अनुपात पूरी तरह बदल सकता है, जिससे भारत का हर वो युवा जो विज्ञान में रुचि रखता है, अंतरिक्ष में जाने का सपना देख सकेगा।

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