Eye Donation: दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे में जान गंवाने वाले मध्य प्रदेश के देवास निवासी अर्पित जाज की आंखें अब किसी जरूरतमंद की जिंदगी में रोशनी ला सकती हैं। बेटे की मौत के गम के बीच अर्पित के माता-पिता ने साहसिक फैसला लेते हुए उसके नेत्रदान का निर्णय लिया। उनका कहना है कि अर्पित की आंखों से किसी और की दुनिया रोशन होगी, यही उनके बेटे के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
अर्पित दिल्ली के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। हादसे में उसकी मौत के बाद परिवार ने दुख की घड़ी में मानवता की मिसाल पेश करते हुए नेत्रदान का कदम उठाया। इस फैसले ने एक बार फिर देश में नेत्रदान की जरूरत और इसके महत्व को सामने ला दिया है।
भारत में कैसे होता है नेत्रदान?
भारत में नेत्रदान की प्रक्रिया काफी सरल है। पहले के समय में तकनीकी सुविधाओं और जागरूकता की कमी के कारण यह प्रक्रिया मुश्किल मानी जाती थी, लेकिन अब आई बैंक और स्वास्थ्य संस्थानों की मदद से इसे आसानी से पूरा किया जा सकता है।
नेत्रदान के लिए व्यक्ति को जीवित रहते हुए अपनी इच्छा दर्ज करानी होती है या फिर मृत्यु के बाद परिवार की सहमति से भी नेत्रदान कराया जा सकता है।
उम्र, धर्म या चश्मा लगाने से नहीं पड़ता फर्क
नेत्रदान को लेकर कई लोगों के मन में गलत धारणाएं होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नेत्रदान के लिए उम्र, लिंग, धर्म या चश्मा लगाने जैसी बातें बाधा नहीं बनतीं। अगर किसी व्यक्ति को चश्मा लगता है, मोतियाबिंद की समस्या रही है या आंखों से जुड़ी कुछ सामान्य परेशानियां हैं, तब भी नेत्रदान संभव हो सकता है।
मृत्यु के 6 घंटे के अंदर जरूरी है प्रक्रिया
सिर्फ 20 मिनट में पूरी हो जाती है प्रक्रिया
नेत्रदान की प्रक्रिया में बहुत कम समय लगता है। मृतक की आंखों से कॉर्निया निकालने में करीब 20 मिनट का समय लगता है। इसके लिए किसी विशेष व्यवस्था या ऑपरेशन थिएटर की जरूरत नहीं होती। नेत्रदान के बाद शरीर की बनावट में कोई बदलाव नहीं आता और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी सामान्य रूप से की जा सकती है।
दान की गई आंखों का इस्तेमाल केवल जरूरतमंद लोगों की दृष्टि वापस लाने के लिए किया जाता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता और न ही किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है।
एक नेत्रदान से दो लोगों को मिल सकती है रोशनी
एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो जरूरतमंद लोगों की जिंदगी में उजाला आ सकता है। आमतौर पर एक वर्ष से अधिक उम्र के मृत व्यक्ति की आंखें दान की जा सकती हैं। अर्पित जाज के माता-पिता का यह फैसला समाज के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने बेटे की याद को केवल दुख तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसकी आंखों के जरिए दूसरों के जीवन में रोशनी पहुंचाने का रास्ता चुना।

