BJP Meeting: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की हलचल के बीच राजनीतिक शह-मात का खेल तेज हो गया है। नेताओं का पाला बदलना और पर्दे के पीछे बैठकों का दौर जारी है। सूबे के दो सबसे बड़े दलों, भाजपा और सपा, के बीच सीधी खींचतान के बीच एक नई मुलाकात ने सियासी पारे को अचानक बढ़ा दिया है। हाल ही में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय प्रमुख रघुराज प्रताप सिंह उर्फ 'राजा भैया' के बीच हुई सीधी मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
पर्दे के पीछे खिचड़ी या नए समीकरण?
हालांकि, इस हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। लेकिन राजनीति को करीब से समझने वालों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले हुई इस तरह की बैठकों के मायने काफी गहरे होते हैं। राजा भैया उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी पार्टी को भाजपा और सपा के बाद एक अहम ताकत के रूप में देखते हैं। उनका गणित साफ है—विधानसभा में जनसत्ता दल के पास कांग्रेस के बराबर और बसपा से ज्यादा विधायक हैं। इसके अलावा विधान परिषद (MLC) में भी उनकी पार्टी का एक सदस्य है। लंबे समय से राजा भैया के खेमे की यह कसक रही है कि क्षेत्र में ठोस सियासी आधार होने के बावजूद भाजपा उन्हें वह तवज्जो नहीं देती, जिसके वे हकदार हैं।
MLC चुनाव और भाजपा की सियासी मजबूरी
उत्तर प्रदेश में जल्द ही 11 विधान परिषद सीटों पर चुनाव होने हैं। इनमें से कई सीटें ऐसी हैं जहाँ भाजपा को आसान जीत के बजाय कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीटों का यह फंसा हुआ पेच ही भाजपा को छोटे और क्षेत्रीय दलों की ओर रुख करने पर मजबूर कर रहा है। MLC चुनावों में जीत का गणित साधने के लिए ही भाजपा ने जनसत्ता दल के दरवाजे पर दस्तक दी है। हालांकि, बंद कमरे में हुई इस बातचीत का नतीजा क्या निकला, इसका खुलासा होना अभी बाकी है।
क्या सिर्फ MLC चुनाव तक सीमित रहेगा साथ?
राजा भैया अक्सर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहते हैं। उनके कई बयान और रुख भाजपा की मूल विचारधारा से मेल खाते दिखाई देते हैं। यही वैचारिक नजदीकी भाजपा के लिए उनसे हाथ मिलाने का सबसे सहज रास्ता बनाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह मुलाकात सिर्फ विधान परिषद चुनाव की तात्कालिक जरूरत तक सीमित रहेगी, या फिर आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में भी दोनों दल एक ही मंच पर नजर आएंगे? वजह चाहे जो भी हो, इस एक मुलाकात ने राज्य के चुनावी माहौल में नया रोमांच पैदा कर दिया है।






