सीट शेयरिंग पर फंसा पेंच, दोनों ओर से शर्तें सख्त
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से इस गठबंधन की चर्चा चल रही है, लेकिन अभी तक यह तस्वीर साफ नहीं हो पाई है कि सपा और कांग्रेस कितनी-कितनी सीटों पर किस्मत आजमाएंगी। दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने गढ़ को बचाने के लिए सख्त शर्तें सामने रखी हैं:
सपा का रुख: समाजवादी पार्टी अपनी उन सभी पारंपरिक सीटों को अपने पास ही रखना चाहती है जहाँ उसकी पकड़ मजबूत है। इसके अलावा, जिन सीटों पर पिछले चुनावों में पार्टी के प्रत्याशी भले ही हार गए हों, लेकिन कांटे की टक्कर दी थी, सपा उन पर भी अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है।
कांग्रेस की दावेदारी: दूसरी ओर, कांग्रेस भी अपने जनाधार और प्रभाव वाली सीटों पर कोई समझौता करने के मूड में नहीं दिख रही है।
माना जा रहा है कि इस गतिरोध को सुलझाने के लिए बहुत जल्द दिल्ली में दोनों दलों के शीर्ष नेताओं की एक अहम बैठक होने जा रही है, जिसके बाद सीट शेयरिंग का औपचारिक ऐलान संभव है।
लोकसभा चुनाव के नतीजों से बढ़ा हौसला
सपा और कांग्रेस के इस रणनीतिक मेल के पीछे हालिया लोकसभा चुनाव के नतीजे सबसे बड़ा कारण हैं। लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर मैदान संभाला था और प्रदेश में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन को जोरदार पटखनी दी थी। सियासी आंकड़े गवाही देते हैं कि जब-जब यूपी में सपा और कांग्रेस का हाथ साथ आया है, तब-तब नतीजों में एक बड़ा उछाल देखा गया है। इसी ट्रैक रिकॉर्ड के भरोसे दोनों दल आगामी विधानसभा चुनाव में भी बड़ी कामयाबी की उम्मीद जता रहे हैं।
क्या रंग लाएगा यह गठबंधन?
फिलहाल दोनों ही पार्टियां अपने कोर वोट बैंक और मजबूत सीटों को बचाने की बिसात बिछा रही हैं। ऐसे में दिल्ली में होने वाली बैठक पर सभी की निगाहें टिकी हैं। अब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि सीट बंटवारे के इस पेच को सुलझाकर यह गठबंधन यूपी की चुनावी बाजी में कितना असर दिखा पाता है।







