CG High Court: बालोद जिले के जुंगेरा गांव में सामाजिक बैठक के दौरान लगाए गए जुर्माने और गांव से बाहर करने की धमकी के बाद एक व्यक्ति की आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में आरोपी बनाए गए आठ लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि आरोपितों ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया था या जानबूझकर ऐसा कोई कदम उठाया था, जिसका उसकी आत्महत्या से सीधा संबंध हो।
मामले की सुनवाई जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ में हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी गांव की बैठक में मौजूद रहने भर से सभी लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाने का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और उसके कृत्य का स्पष्ट आधार होना जरूरी है।
बैठक में 30 हजार रुपए का जुर्माना लगाने का आरोप
यह मामला बालोद जिले के जुंगेरा गांव का है। मृतक ओमप्रकाश भुआर्य की पत्नी ईश्वरी भुआर्य और बेटे अमित भुआर्य ने आठ लोगों के खिलाफ विशेष न्यायालय में निजी परिवाद दायर किया था। शिकायत के मुताबिक, 10 मई 2024 को गांव में एक बैठक आयोजित की गई थी। इसमें ओमप्रकाश पर गांव की लड़कियों को लेकर अपमानजनक बातें फैलाने और समिति के सदस्यों के साथ गाली-गलौज करने का आरोप लगाया गया। परिजनों का कहना था कि बैठक में ओमप्रकाश पर 30 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया था। रकम जमा नहीं करने पर परिवार को गांव से बाहर करने की धमकी भी दी गई। इस घटना के बाद ओमप्रकाश मानसिक रूप से परेशान थे और उन्हें अपमान महसूस हो रहा था। इसके कुछ दिन बाद 16 और 17 मई 2024 की दरमियानी रात उन्होंने अपने घर में फांसी लगाकर जान दे दी।
विशेष न्यायालय के आदेश को हाई कोर्ट में दी गई चुनौती
परिजनों की शिकायत पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायालय ने 23 अप्रैल 2025 को आठों आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 500, 306 और 149 के साथ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। इस आदेश को आरोपितों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले में पहले छह फरवरी 2026 को हाई कोर्ट की खंडपीठ ने निचली अदालत की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई थी।
सात दिन के अंतर और आरोपितों की भूमिका पर कोर्ट ने उठाए सवाल
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बैठक में जुर्माने की राशि शीतला मंदिर में दान के लिए तय की गई थी। मृतक ने बैठक में अपनी बात स्वीकार कर रजिस्टर पर हस्ताक्षर भी किए थे। किसी अपीलकर्ता ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया या जानबूझकर ऐसा दबाव बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। पुलिस की जांच में भी आत्महत्या के पीछे पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याओं की बात सामने आई थी। वहीं, मृतक के परिजनों की ओर से दलील दी गई कि 30 हजार रुपए जमा करने का दबाव बनाया गया और ऐसा नहीं करने पर गांव से बाहर करने की धमकी दी गई थी। इससे परेशान होकर ओमप्रकाश ने आत्महत्या की।SC-ST एक्ट और मानहानि की धाराओं पर भी कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि मृतक का अनुसूचित जनजाति वर्ग से होना अपने आप में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(v) लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह स्थापित होना जरूरी है कि अपराध उसकी जनजातीय पहचान के कारण किया गया था। इसी तरह, भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि का मामला चलाने के लिए किसी विशेष आरोपित की ओर से मानहानिकारक बयान दिए जाने का आधार होना चाहिए। इस मामले में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223(1) के प्रावधान का भी उल्लेख किया। इसके अनुसार, निजी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक है। इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने विशेष न्यायालय का 23 अप्रैल 2025 का आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही आठों अपीलकर्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही भी रद्द कर दी।







