CG News: दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही दुर्ग जिले के ग्राम जेवरा सिरसा में मिट्टी के दीये बनाने का काम तेज हो गया है। जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की कुम्हार बस्ती में इन दिनों घरों के आंगन, कमरे और छतें दीयों से भरी नजर आ रही हैं। परिवार के पुरुषों के साथ महिलाएं भी इस काम में जुटी हैं। कई जगह बच्चे भी दीये बनाने में हाथ बंटा रहे हैं। सुबह से देर रात तक चाक चल रहे हैं और तैयार दीयों को बाजार भेजने की तैयारी की जा रही है।
35 हजार दीयों का दिया था ऑर्डर
धमधा नाका दुर्ग निवासी तुलसी राम ढीमर ने 35 हजार दीयों का आर्डर दिया था जिसे वे गुरुवार को लेने पहुंचे। तुलसी राम ने बताया कि हर साल दीपावली त्योहार पर वे दीया बेचने का काम करते हैं। इस सीजन में वे करीब 50 हजार दीये बेच डालते हैं।
42 साल से खरीद रहे हैं दीये
मनोज कुंभकार के यहां दीया खरीदने पहुंचे भिलाई के व्यापारी सुरेश चंद्र ने बताया कि वे पिछले 42 साल से दीया खरीदने के लिए इस गांव में आ रहे हैं। उनके अलावा भिलाई के कई व्यापारी यहां दीयों की खरीदकारी करने अलग-अलग कुंभकारों के पास आते हैं। उन्होंने बताया कि पोरा त्योहार से दीयों का बाजार शुरू हो जाता है जो देव उठनी एकादशी तक चलता है।मनोज कुंभकार के परिवार को मिला 25 लाख दीयों का ऑर्डर
गांव के निवासी मनोज कुंभकार के घर में उनकी पत्नी, बेटे और बहू सहित पांच लोग दीये बनाने के काम में लगे हैं। मनोज के मुताबिक, उन्हें इस सीजन में 25 लाख दीये बनाने का ऑर्डर मिला था, जिसे वे पूरा कर भेज चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनका परिवार सालभर मिट्टी के दीये बनाता है।
175 कुम्हार परिवारों की आजीविका का सहारा है दीया निर्माण
करीब 10 हजार की आबादी वाले जेवरा सिरसा गांव में लगभग 175 कुम्हार परिवार दीये बनाने का काम करते हैं। गणेशोत्सव के बाद से ही यहां उत्पादन में तेजी आ जाती है। अधिकांश परिवारों के पास चार से पांच चाक हैं, जिनकी मदद से दिनभर में हजारों दीये तैयार किए जाते हैं।दुर्ग-भिलाई में चार करोड़ दीयों की खपत का दावा
कुंभकार समाज के संरक्षक सतीश कुंभकार के मुताबिक, जेवरा सिरसा की बस्ती में रहने वाले अधिकांश कुम्हार परिवार त्योहार के मौसम में दीये बनाने में जुट जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि दुर्ग-भिलाई के बाजारों में दीपावली के सीजन में करीब चार करोड़ दीयों की खपत होती है। बड़ी मांग को पूरा करने के लिए कुम्हार परिवार लगातार मेहनत करते हैं। मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार करने की यह पारंपरिक कला आज भी स्थानीय बाजारों में अपनी जगह बनाए हुए है और दीपावली के साथ इन परिवारों की उम्मीदें भी रोशन हो रही हैं।







