State Tax Inspector Recruitment: 2021 और 2022 की नियुक्तियां रद्द करने का आदेश बरकरार, नए सिरे से होगी प्रक्रिया
State Tax Inspector Recruitment: बिलासपुर हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य कर निरीक्षक की 2021 और 2022 की विभागीय परीक्षाओं में अनियमितताओं के चलते नियुक्तियां रद्द करने के सरकार के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने नई भर्ती प्रक्रिया पारदर्शिता के साथ जल्द शुरू करने का निर्देश दिया।
State Tax Inspector Recruitment: छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ाने वाले एक अहम मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य कर निरीक्षक (State Tax Inspector) की 2021 और 2022 की
विभागीय भर्ती परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां सामने आने के बाद नियुक्तियां रद्द करने के सरकार के कदम को पूरी तरह सही ठहराया है। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने दो नवंबर को अपना फैसला सुनाते हुए अधिकारियों की कार्रवाई में दखल देने से साफ इनकार कर दिया और इस मामले में दाखिल सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार को यह सख्त निर्देश भी दिया है कि वह पूरी पारदर्शिता के साथ नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करे।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद वाणिज्यिक कर विभाग के अंतर्गत सहायक ग्रेड-3 के पद पर पहले से कार्यरत कर्मचारियों की सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा से जुड़ा है। इन कर्मचारियों ने साल 2021 और 2022 की परीक्षा में हिस्सा लिया था और सफल होने के बाद उन्हें प्रमोट करके राज्य कर निरीक्षक बना दिया गया था। इनमें से कई कर्मचारी ऐसे भी थे जिनकी सेवाएं पक्की (प्रोबेशन पीरियड पूरा कर चुके) भी हो चुकी थीं। लेकिन इसी बीच परीक्षा में
बड़े पैमाने पर धांधली और गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आने लगीं।मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। इस समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर सरकार ने 11 सितंबर को पूरी परीक्षा और उसके आधार पर दी गई नियुक्तियों को रद्द कर दिया। साथ ही, इन सभी कर्मचारियों को उनके पुराने मूल पदों पर वापस लौटने का आदेश जारी कर दिया गया, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंच गया था।
जांच समिति की रिपोर्ट में खुलासे: कॉपियों में हेरफेर से लेकर कल्पित आंकड़ों तक
जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे हैरान करने वाले थे। दोनों सालों की परीक्षाओं में नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं:
साल 2021 की परीक्षा: इस साल की परीक्षा में कॉपियों (उत्तर पुस्तिकाएं) की कोडिंग को लेकर गंभीर लापरवाही बरती गई। कॉपियों को बिना कोडिंग के ही सीलबंद हालत में लाया गया था, जिससे बाद में कोडिंग के दौरान अभ्यर्थियों के नाम और रोल नंबर छिपाए ही नहीं जा सके। जांच में यह भी सामने आया कि 22 उत्तर पुस्तिकाओं के अंकों में लाल पेन से काट-छांट करके नंबर बढ़ाए गए थे। इसके अलावा, 30 पदों पर आरक्षण के तय नियमों (रोस्टर) का भी पालन नहीं किया गया था।
- साल 2022 की परीक्षा: इस परीक्षा में तो हद ही हो गई। उत्तर पुस्तिकाओं पर न तो परीक्षा केंद्र की मुहर थी और न ही जांचने वाले परीक्षकों के हस्ताक्षर या नाम दर्ज थे। नियमों में पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) का कोई प्रावधान न होने के बावजूद 37 कॉपियों की दोबारा जांच कराई गई। सबसे बड़ा झोल कॉपियों की गिनती में मिला—जांच में 1,497 उत्तर पुस्तिकाएं इस्तेमाल में लाई गईं, जबकि विभाग ने खरीदी केवल 1,300 कॉपियां थीं। यानी सीधे तौर पर 197 कॉपियों का कोई हिसाब-किताब नहीं मिला। इतना ही नहीं, कुछ अभ्यर्थियों के जवाब मॉडल आंसर्स से अक्षरशः (शब्द-दर-शब्द) मेल खाते पाए गए।
याचिकाकर्ताओं की दलील: बिना सुने कार्रवाई करना गलत
नौकरी गंवाने वाले याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया था कि उन्होंने पूरी ईमानदारी और नियमानुसार परीक्षा पास की थी। इसके बाद उन्होंने कठिन विभागीय परीक्षाएं और ट्रेनिंग पूरी की और सालों तक अपनी सेवाएं दीं। कई कर्मचारी ऐसे थे जिनकी सेवा की पुष्टि (कन्फर्मेशन) भी हो चुकी थी। उनका मुख्यत: यह कहना था कि सरकार ने कार्रवाई से पहले उन्हें न तो कोई कारण बताओ (Show Cause) नोटिस दिया और न ही जांच रिपोर्ट या आरोपों पर अपना पक्ष रखने का कोई मौका दिया। वकीलों के जरिए यह भी दलील दी गई कि अगर कुछ लोगों ने गड़बड़ी की है, तो इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर दोषियों को सजा दी जानी चाहिए; बिना कसूर साबित किए सभी की नियुक्तियां रद्द करना नैसर्गिक न्याय के खिलाफ है।
कोर्ट की दो टूक: 500 से ज्यादा की भीड़ में दूध का दूध, पानी का पानी करना मुमकिन नहीं
राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा गया कि परीक्षा में जिस स्तर पर व्यापक और गंभीर अनियमितताएं पाई गईं, वहां पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता ही दांव पर लग चुकी थी। हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क से सहमति जताई। अदालत ने माना कि 500 से अधिक अभ्यर्थियों वाली इस बड़ी परीक्षा में एक-एक करके दोषी और निर्दोष कर्मचारियों को अलग-अलग छांट पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। जिस तरह से कॉपियों और अंकों के साथ खिलवाड़ हुआ है, वह पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसी स्थिति में, पूरी भर्ती प्रक्रिया को ही निरस्त करने का सरकार का फैसला किसी भी लिहाज से अनुचित नहीं कहा जा सकता।