Doosra Movie Review: भारत में क्रिकेट का जुनून किस तरह लोगों की जिंदगी और सोच को प्रभावित करता है, इसे फिल्म दूसरा में दिखाने की कोशिश की गई है। सौरव गांगुली के क्रिकेट करियर के यादगार पलों को एक लड़की के संघर्ष और अपनी पहचान के लिए उसकी लड़ाई से जोड़कर कहानी बुनी गई है। हालांकि, मजबूत विचार के साथ शुरू हुई यह फिल्म आखिर तक वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाती, जिसकी उम्मीद की जाती है। प्लाबिता बोरठाकुर, अंकुर विकल और ट्विशा जोशी अभिनीत यह स्पोर्ट्स-ड्रामा 23 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म का निर्देशन अभिनय देव ने किया है। क्रिकेट और महिला सशक्तिकरण को एक साथ पर्दे पर उतारने का प्रयास सराहनीय है।
फिल्म की कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी 1991 से 2002 के बीच के दौर में आगे बढ़ती है। इसमें दो समानांतर घटनाक्रम दिखाए गए हैं। पहली कहानी भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली की है, जो अपने आक्रामक अंदाज और बेखौफ फैसलों से भारतीय क्रिकेट की पुरानी पहचान बदल रहे थे। दूसरी कहानी राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में पली-बढ़ी तारा (प्लाबिता बोरठाकुर) की है। तारा एक ऐसे माहौल में बड़ी हो रही है, जहां लड़कियों की आजादी और अपनी पसंद से जिंदगी जीने पर कई तरह की पाबंदियां हैं। परिवार और समाज की बंदिशों के बीच वह अपनी पहचान बनाने का सपना देखती है। सौरव गांगुली के क्रिकेट करियर में आने वाले बदलाव और उनकी बेबाकी तारा को भी अपने हक के लिए लड़ने की प्रेरणा देते हैं।
निर्देशन और कहानी में कहां रह गई कमी?
देल्ही बेली जैसी फिल्म बना चुके अभिनय देव ने 'दूसरा' के लिए एक अलग विषय चुना है। फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसमें वास्तविक क्रिकेट फुटेज और काल्पनिक कहानी को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। सौरव गांगुली के करियर से जुड़े पुराने मैचों के दृश्य दिखाने के साथ हर्षा भोगले, शशि थरूर, राजदीप सरदेसाई और शेखर कपूर जैसी हस्तियों के इंटरव्यू भी शामिल किए गए हैं। इससे फिल्म को डॉक्यूमेंट्री जैसा वास्तविक अनुभव मिलता है। लेकिन यही प्रयोग फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाता है। जिस तारा के संघर्ष को कहानी का मुख्य आधार होना चाहिए था, उसके मुकाबले सौरव गांगुली के क्रिकेट करियर के किस्से ज्यादा प्रभावशाली बनकर सामने आते हैं।कलाकारों का अभिनय कैसा है?
अभिनय के मामले में ट्विशा जोशी ने तारा के बचपन वाले किरदार को अच्छे तरीके से निभाया है। उनके अभिनय में एक ऐसी लड़की की जिद और बेचैनी दिखाई देती है, जो अपने आसपास की बंदिशों को स्वीकार नहीं करना चाहती। वहीं, प्लाबिता बोरठाकुर ने बड़े होने के बाद तारा के किरदार को आगे बढ़ाया है। उनके चेहरे पर मासूमियत और विरोध के भाव नजर आते हैं। हालांकि, राजस्थानी भाषा के संवादों में उनका सहजपन थोड़ा कम दिखाई देता है।
क्या यह मूवी देखनी चाहिए?
दूसरा का विचार नया और दिलचस्प है। क्रिकेट के एक ऐतिहासिक दौर को महिला की आजादी और आत्मसम्मान की कहानी से जोड़ना फिल्म को अलग पहचान देता है। खासकर 1990 के दशक और शुरुआती 2000 के भारतीय क्रिकेट को करीब से देखने वाले दर्शकों के लिए इसमें पुरानी यादें ताजा करने वाले कई पल हैं। हालांकि, युवा दर्शकों के लिए उस दौर के क्रिकेट से भावनात्मक जुड़ाव बनाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। वहीं, महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित कहानी भी उतनी मजबूती से सामने नहीं आ पाती, जितनी उम्मीद फिल्म के विषय को देखकर होती है।












