Meethe Mein Kya Hai Film Review: दिवाली का त्योहार, घर में जुटे अपने लोग और रिश्तों के बीच छिपी छोटी-बड़ी खुशियां फिल्म में इन्हीं एहसासों को पर्दे पर उतारती है। लेखिका और निर्देशक राधिका बंसल की पहली फिल्म परिवार, प्यार, बिछड़ने के दर्द और अपनों के साथ की अहमियत को एक हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करती है। फिल्म की कहानी यह बताती है कि जिंदगी में मुश्किल वक्त कितना भी लंबा क्यों न हो, परिवार का साथ कई दर्द कम कर सकता है।
क्या है कहानी
फिल्म की कहानी जय (ऋत्विक भौमिक) और उसके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। जय अपनी पत्नी तारा (कनिका कपूर) को खोने के बाद अब तक उस सदमे से बाहर नहीं निकल पाया है। दो साल बीतने के बावजूद वह पुरानी यादों में उलझा हुआ है। इसी बीच वह अपनी संपत्ति बेचकर विदेश में बसने का फैसला करता है। लेकिन उसकी योजनाओं के बीच एक नया मोड़ आ जाता है। जय की बहन सना (दलाई) परिवार को बिना बताए करम (विक्रम बख्शी) से शादी कर लेती है। इस खबर के बाद जय को दिवाली के मौके पर लखनऊ में अपनी नानी के घर पहुंचना पड़ता है, जहां पूरा परिवार त्योहार मनाने के लिए इकट्ठा होता है। एक तरफ सना की शादी को लेकर परिवार में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं, तो दूसरी ओर जय अपने अतीत के दर्द से जूझ रहा है। दिवाली की रौनक, रिश्तेदारों की बातचीत, हंसी-मजाक और आपसी नोकझोंक के बीच कहानी आगे बढ़ती है।
कैसी है पूरी फिल्म?
राधिका बंसल ने अपनी पहली फिल्म में एक ऐसी पारिवारिक कहानी चुनने की कोशिश की है, जिससे दर्शक आसानी से जुड़ सकें। फिल्म के कई दृश्य घर-परिवार में होने वाली आम बातचीत और त्योहारों के दौरान होने वाली हलचल की याद दिलाते हैं। नानी-दादी, मामा-मामी, बुआ-फूफा और कजिन्स के बीच का अपनापन कहानी को घरेलू रंग देता है। फिल्म की अच्छी बात यह है कि रिश्तों को दिखाने के लिए बेवजह के ड्रामे का सहारा नहीं लिया गया है। सना की शादी का फैसला इसका उदाहरण है। करम पहले से शादीशुदा है और उसकी एक बेटी भी है। इस बात पर परिवार में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। हालांकि, कहानी इस घटनाक्रम को बहुत ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय सहज तरीके से आगे बढ़ाती है। फिल्म की रफ्तार और स्क्रीनप्ले में थोड़ी और मजबूती होती तो इसका प्रभाव बेहतर हो सकता था।देखें या नहीं?
यह एक ऐसी फिल्म है, जो बड़े ट्विस्ट और चौंकाने वाले घटनाक्रम के बजाय रिश्तों की छोटी-छोटी खुशियों पर ध्यान देती है। कहानी में कुछ जगह भावनात्मक गहराई और मनोरंजन की कमी महसूस होती है, लेकिन त्योहार के माहौल और परिवार के साथ बिताए पलों को खूबसूरती से दिखाया गया है। अगर आप दिवाली पर हल्की-फुल्की पारिवारिक फिल्म देखना चाहते हैं, तो इसे अपनी वॉचलिस्ट में शामिल कर सकते हैं। यह फिल्म याद दिलाती है कि त्योहारों की असली मिठास पकवानों में ही नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों में भी होती है।







