Dupahiya Season 2 Review: धड़कपुर गांव की वही जानी-पहचानी गलियां, अपनी ही उलझनों में उलझे लोग और रोजमर्रा की जिंदगी से निकलता हास्य... प्राइम वीडियो की चर्चित सीरीज दुपहिया अपने दूसरे सीजन के साथ लौट आई है। आठ एपिसोड की यह सीरीज एक बार फिर दर्शकों को उसी मिट्टी की सोंधी महक और ठेठ देसीपन से जोड़ती है, जिसकी वजह से इसके पहले सीजन को खूब प्यार मिला था।
कहानी: अफवाहें, सपने और हकीकत
कहानी की शुरुआत वहीं से होती है जहां पहला सीजन खत्म हुआ था। बनवारी लाल झा (गजराज राव) का परिवार अब भी अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश में जुटा है। नौकरी छूटने के बाद घर चलाना मुश्किल हो रहा है, ऐसे में बनवारी को अपनी बंजर जमीन पर मोबाइल टावर लगवाने का प्रस्ताव किसी तिनके के सहारे जैसा लगता है। लेकिन गांव वाले इसे तरक्की की जगह आफत मान लेते हैं। टावर लगते ही धड़कपुर में अफवाहों की आंधी आ जाती है—लोग इसे टाइफाइड, सुनामी और नपुंसकता जैसी बीमारियों से जोड़ने लगते हैं। गांव की सरपंच पुष्पलता (रेणुका शहाणे) इस विरोध का चेहरा बन जाती हैं, जिससे मामला पूरी तरह सियासी रूप ले लेता है। दूसरी तरफ, बनवारी की बेटी रोशनी (शिवानी रघुवंशी) टूटी सगाई के गम को पीछे छोड़कर एसएससी परीक्षा की तैयारी में दिन-रात एक कर रही है। उसके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि खुद को साबित करने की जंग है। इस राह में अमावस (भुवन अरोड़ा) उसका संबल बनता है।
स्क्रीनप्ले और निर्देशन
निर्माता अविनाश द्विवेदी, चिराग गर्ग और निर्देशक सोनम नायर ने छोटे शहर की मानसिकता, अंधविश्वास और आधुनिकता के बीच के इस द्वंद्व को बेहद सहजता से उभारा है। 'ऐ जी, ओ जी, लो जी 5G' और 'परीक्षा' जैसे एपिसोडिक टाइटल्स कहानी के मूड को बखूबी दर्शाते हैं। सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसका अतिरंजना से दूर रहना है। हालांकि, मध्य के कुछ एपिसोड्स में मोबाइल टावर वाला ट्रैक थोड़ा सुस्त पड़ता है और रफ्तार धीमी होती है। पेपर लीक वाले पहलू को भी अगर थोड़ा और गहराई से दिखाया जाता तो इसका असर ज्यादा दमदार हो सकता था। इसके बावजूद, किरदारों की बेवकूफियां और चुटीले संवाद दर्शकों को जोड़े रखते हैं।
निर्माता अविनाश द्विवेदी, चिराग गर्ग और निर्देशक सोनम नायर ने छोटे शहर की मानसिकता, अंधविश्वास और आधुनिकता के बीच के इस द्वंद्व को बेहद सहजता से उभारा है। 'ऐ जी, ओ जी, लो जी 5G' और 'परीक्षा' जैसे एपिसोडिक टाइटल्स कहानी के मूड को बखूबी दर्शाते हैं। सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसका अतिरंजना से दूर रहना है। हालांकि, मध्य के कुछ एपिसोड्स में मोबाइल टावर वाला ट्रैक थोड़ा सुस्त पड़ता है और रफ्तार धीमी होती है। पेपर लीक वाले पहलू को भी अगर थोड़ा और गहराई से दिखाया जाता तो इसका असर ज्यादा दमदार हो सकता था। इसके बावजूद, किरदारों की बेवकूफियां और चुटीले संवाद दर्शकों को जोड़े रखते हैं।
कैसा है अभिनय ?
अभिनय के मोर्चे पर यह सीरीज बेहद मजबूत है। स्पर्श श्रीवास्तव (भूगोल) ने एक बार फिर साबित किया है कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं। अपने अपमान को हथियार बनाने वाले एक डांसर के रूप में उनका दर्द और जज्बा स्क्रीन पर साफ झलकता है। गजराज राव हमेशा की तरह अपने अभिनय से जान फूंक देते हैं। स्पर्श और गजराज के बीच पिता-पुत्र का टकराव सीरीज के सबसे मजबूत सीन में से एक है। रेणुका शहाणे ने सरपंच के रूप में बेहद सधा हुआ काम किया है, वहीं भुवन अरोड़ा की कॉमिक टाइमिंग कमाल की है। यशपाल शर्मा, निरहुआ (दिनेश लाल यादव) और अंजुमन सक्सेना समेत बाकी सह-कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है।देखें या न देखें ?
'दुपहिया सीजन 2' में भले ही कहानी की रफ्तार बीच में थोड़ी धीमी पड़ती हो, लेकिन इसका सादापन, बेहतरीन अभिनय और जमीन से जुड़ी हास्य शैली इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको हल्की-फुल्की, पारिवारिक और सामाजिक संदेश देने वाली कहानियां पसंद हैं, तो यह सीरीज आपको निराश नहीं करेगी।

