Dont Be Shy Movie Review: आलिया भट्ट के बैनर तले बनी नई फिल्म 'डोंट बी शाय' (Don't Be Shy) आखिरकार अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो चुकी है। स्रीति मुखर्जी के निर्देशन और लेखन में बनी यह फिल्म आज के टीनेजर्स यानी जेन-जी (Gen Z) के प्यार, ब्रेकअप और पर्सनल ड्रामे को करीब से देखने की कोशिश करती है। कैंपस लाइफ पर बनी इस फिल्म में पढ़ाई-लिखाई को छोड़कर बाकी सब कुछ दिखता है। इसे देखते वक्त एक पल के लिए करण जौहर की 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' की याद जरूर आती है, हालांकि स्रीति मुखर्जी ने इसे उस तरह के बड़े ग्लैमरस टच से दूर रखा है।
क्या है कहानी का ताना-बाना ?
फिल्म का ताना-बाना श्यामाली यानी 'शाई' दास (आरुषि बजाज) के इर्द-गिर्द बुना गया है। शाई का सपना अपने बेहद अमीर बॉयफ्रेंड मयंक (पीयूष खाती) की बदौलत अपनी जिंदगी संवारने का है। लेकिन उसकी यह सोच तब टूटती है जब मयंक अचानक उससे दूरी बना लेता है। दिल टूटने के बाद बदला लेने की चाहत में शाई, मयंक की नई गर्लफ्रेंड तारा (बियांका अरोड़ा) के सामने आ खड़ी होती है। यहाँ से शुरू होता है शाई का खुद को तलाशने का सफर। शुरुआत के 30 मिनट में फिल्म थोड़ी भटकती हुई लगती है और दर्शक यह समझने में उलझे रहते हैं कि कहानी आखिर किस दिशा में जा रही है, लेकिन धीरे-धीरे यह टीनेज लाइफ की परिपक्वता की तरफ बढ़ती है।
कहाँ कमजोर पड़ी फिल्म ?
डोंट बी शाय की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह टीनेजर्स की दुनिया को बेहद सतही तौर पर दिखाती है। ऐसा लगता है मानो बड़ों की नजर से आज की पीढ़ी को समझने और दिखाने की कोशिश की गई हो। फिल्म में आज के दौर के युवाओं का तनाव और उनके भविष्य की उलझनों को उठाने का प्रयास तो हुआ है, लेकिन ढीले और उबाऊ स्क्रीनप्ले की वजह से यह मुद्दा दर्शकों से जुड़ नहीं पाता। 15 साल से अधिक उम्र के दर्शकों को बाँधने के लिए इसमें कुछ खास नहीं है। कुणाल रॉय कपूर (प्रोफेसर के रोल में) और जाने-माने डायरेक्टर अनुराग बसु (शाई के पिता के रोल में) जैसे सीनियर चेहरे भी फिल्म को खास सहारा नहीं दे पाते। उनके किरदारों को जबरन ठूँसा हुआ सा महसूस होता है।
डोंट बी शाय की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह टीनेजर्स की दुनिया को बेहद सतही तौर पर दिखाती है। ऐसा लगता है मानो बड़ों की नजर से आज की पीढ़ी को समझने और दिखाने की कोशिश की गई हो। फिल्म में आज के दौर के युवाओं का तनाव और उनके भविष्य की उलझनों को उठाने का प्रयास तो हुआ है, लेकिन ढीले और उबाऊ स्क्रीनप्ले की वजह से यह मुद्दा दर्शकों से जुड़ नहीं पाता। 15 साल से अधिक उम्र के दर्शकों को बाँधने के लिए इसमें कुछ खास नहीं है। कुणाल रॉय कपूर (प्रोफेसर के रोल में) और जाने-माने डायरेक्टर अनुराग बसु (शाई के पिता के रोल में) जैसे सीनियर चेहरे भी फिल्म को खास सहारा नहीं दे पाते। उनके किरदारों को जबरन ठूँसा हुआ सा महसूस होता है।
अभिनय और संगीत का पक्ष
फिल्म की सबसे अच्छी बात इसके नए और युवा कलाकार हैं। अपनी डेब्यू फिल्म में आरुषि बजाज ने एक उलझी हुई टीनेजर के भावों को पर्दे पर काफी ईमानदारी से उतारा है। बियांका अरोड़ा, पीयूष खाती और अंश दुग्गल ने भी अपने किरदारों को सही तरह से निभाया है। म्यूजिक की बात करें तो राम संपत का संगीत फिल्म देखते वक्त तो कानों को सुकून देता है और हल्का-फुल्का अहसास कराता है, लेकिन स्क्रीन से उठने के बाद इसके गाने दिमाग में छाप नहीं छोड़ पाते।देखें या न देखें ?
'डोंट बी शाय' में एक उम्दा कमिंग-ऑफ-एज (युवाओं के आत्म-खोज की) फिल्म बनने का पूरा माद्दा था, लेकिन इसकी कमजोर पटकथा ने पूरे स्वाद को फीका कर दिया। युवा कलाकारों की ऊर्जा ही इस फिल्म को किसी तरह खींचकर आगे बढ़ाती है। अगर दर्शक की उम्र 15 साल या उससे कम है, तो हो सकता है यह ड्रामा थोड़ा पसंद आए। लेकिन इससे बड़े दर्शकों के लिए यह फिल्म किसी लंबी और नीरस स्कूल असेंबली जैसी लगती है, जहाँ इंसान शुरुआत में तो ध्यान देता है पर थोड़ी ही देर में ऊबने लगता है। क्विक फैक्ट्स निर्देशक: स्रीति मुखर्जी मुख्य कलाकार: आरुषि बजाज, पीयूष खाती, बियांका अरोड़ा, अंश दुग्गल, कुणाल रॉय कपूर, अनुराग बसु OTT प्लेटफॉर्म: अमेजन प्राइम वीडियो संगीत: राम संपत हमारी रेटिंग: 2 / 5

