Indian Stock Market: लगातार आठवें हफ्ते गिरावट के साथ बंद हुआ है। बाजार में इतनी लंबी साप्ताहिक गिरावट करीब 25 साल बाद देखने को मिली है। इससे पहले कोरोना महामारी और 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी जैसे बड़े संकटों के दौरान भी भारतीय बाजार लगातार आठ सप्ताह तक नहीं फिसला था।
पिछले आठ हफ्तों में सेंसेक्स करीब 6,590 अंक नीचे आ चुका है, जबकि निफ्टी में लगभग 2,149 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। इस दौरान BSE में सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण में 26 लाख करोड़ रुपए से अधिक की कमी आई है। कुल मार्केट कैप अब 467 लाख करोड़ रुपए के स्तर से नीचे पहुंच गया है। इस साल मार्च-अप्रैल में ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था।
कच्चे तेल के बाद बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई चिंता
ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी। इसका असर दुनियाभर के शेयर बाजारों के साथ भारतीय बाजार पर भी पड़ा। मार्च में सेंसेक्स करीब 9,340 अंक यानी लगभग 11 फीसदी टूट गया था। हालांकि अप्रैल में बाजार ने कुछ सुधार किया और सेंसेक्स में करीब 7 फीसदी की तेजी आई। इस दौरान सूचकांक कुछ समय के लिए 78,000 के स्तर के ऊपर भी पहुंचा। लेकिन 10 अगस्त के बाद बाजार की दिशा फिर बदल गई और इसके बाद लगातार साप्ताहिक गिरावट देखने को मिली। गुरुवार को सेंसेक्स 71,293 के 52 हफ्ते के निचले स्तर तक पहुंच गया। खास बात यह है कि उस समय कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुकी थी। यानी बाजार पर दबाव की वजह सिर्फ तेल की कीमतें नहीं रह गई थीं।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई बाजार की चिंता
मौजूदा गिरावट में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को एक अहम वजह माना जा रहा है। गुरुवार को अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 5.30 फीसदी के पार चली गई। यह स्तर 2007 के बाद सबसे ऊंचा बताया जा रहा है। सितंबर तिमाही में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड में 87 बेसिस पॉइंट से अधिक की बढ़ोतरी हुई। यह 1994 के बाद किसी एक तिमाही में हुई सबसे बड़ी बढ़ोतरी बताई जा रही है। वहीं, 30 साल की ट्रेजरी यील्ड भी 5.65 फीसदी के ऊपर पहुंच गई, जो 2002 के बाद का ऊंचा स्तर है। बॉन्ड यील्ड बढ़ने का सीधा असर निवेश के फैसलों पर पड़ता है। जब बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो निवेशकों के लिए डेट एसेट्स अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकते हैं। इसके उलट, शेयर बाजार में जोखिम लेने की क्षमता पर दबाव बन सकता है।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयर बाजार पर क्यों पड़ता है असर?
बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड आम तौर पर विपरीत दिशा में चलती हैं। जब बॉन्ड की बिकवाली बढ़ती है तो उसकी कीमत घटती है और यील्ड बढ़ती है। ऊंची बॉन्ड यील्ड का असर कंपनियों और शेयरों के मूल्यांकन पर भी पड़ सकता है। ब्याज दरों और पूंजी की लागत बढ़ने से कंपनियों के लिए फंड जुटाना महंगा हो सकता है। साथ ही, निवेशक ऊंचे वैल्यूएशन वाले शेयरों को लेकर अधिक सतर्क हो सकते हैं।एंजेल वन के सीनियर फंडामेंटल एनालिस्ट वकार जावेद खान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में अस्थायी बढ़ोतरी कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर डाल सकती है, लेकिन वैश्विक बॉन्ड यील्ड में लगातार वृद्धि इक्विटी बाजार के लिए ज्यादा व्यापक चुनौती बन सकती है। उनके अनुसार, यील्ड बढ़ने से पूंजी की लागत बढ़ती है, शेयरों के P/E मल्टीपल पर दबाव आता है और उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी बढ़ सकती है।निवेशकों के लिए क्या है अहम?
रेलिगेयर ब्रोकिंग के SVP रिसर्च अजीत मिश्रा के अनुसार, ऊंची बॉन्ड यील्ड से पूंजी की लागत बढ़ने के साथ इक्विटी वैल्यूएशन पर भी दबाव बन सकता है। ऐसे माहौल में फिक्स्ड-इनकम एसेट्स निवेशकों को अपेक्षाकृत आकर्षक लग सकते हैं। इसका असर खास तौर पर ज्यादा वैल्यूएशन वाले और लंबी अवधि की कमाई पर निर्भर शेयरों पर पड़ सकता है। मौजूदा बाजार परिस्थितियों में निवेशकों के लिए जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय कंपनियों के फंडामेंटल पर ध्यान देना जरूरी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत बैलेंस शीट, कमाई की स्पष्ट संभावनाओं और उचित वैल्यूएशन वाली कंपनियों पर नजर रखना अधिक महत्वपूर्ण है। गिरते बाजार में हर शेयर को सिर्फ इसलिए खरीदना कि उसकी कीमत नीचे आ गई है, जोखिम भरा हो सकता है। वहीं, पूरी तरह निचले स्तर का इंतजार करने के बजाय निवेश को चरणबद्ध तरीके से करने की रणनीति पर भी विचार किया जा सकता है। बाजार की दिशा पर बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमत, विदेशी निवेश और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का असर आगे भी महत्वपूर्ण रहेगा।
