Mahasamund Road Problem: जिला मुख्यालय महासमुंद से महज 17 किलोमीटर दूर खल्लारी विधानसभा क्षेत्र का ग्राम पड़कीपाली आज भी सड़क, पुल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव राष्ट्रीय राजमार्ग-353 से केवल 3.5 किलोमीटर दूर है, लेकिन आजादी के 80 साल बाद से अब तक गांव तक पक्की सड़क नहीं बन पाई है। चारों तरफ नदी-नालों से घिरे इस गांव में बारिश के दौरान आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो जाता है और गांव टापू में तब्दील हो जाता है। सड़क और पुल की समस्या के साथ गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। इन समस्याओं से नाराज ग्रामीणों ने हाड़ाबंद के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-353 पर धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान विधायक द्वारिकधीश यादव, सांसद रूपकुमारी चौधरी, PWD मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री अरुण साव और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के खिलाफ नारेबाजी भी की गई।

बारिश में टूट जाता है गांव का संपर्क, बच्चे नहीं जाते स्कूल
पड़कीपाली चारों तरफ से नदी और नालों से घिरा हुआ है। गांव तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क और पुल की व्यवस्था नहीं होने से बारिश के मौसम में आवागमन मुश्किल हो जाता है। कई बार गांव का संपर्क बाहरी क्षेत्रों से कट जाता है। शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है। गांव में आंगनबाड़ी के लिए अपना भवन तक नहीं है। बच्चों को पेड़ के नीचे बैठकर आंगनबाड़ी की कक्षाएं लेनी पड़ती हैं। वहीं, प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को नदी पार कर दूसरे गांव जाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान नदी पार करना बच्चों के लिए जोखिम भरा हो जाता है।
स्वास्थ्य केंद्र नहीं, एंबुलेंस भी नहीं पहुँचती
गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने के कारण लोगों को इलाज के लिए दूसरे स्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्कूल और अस्पताल पास के गाँव कौंवाझर में है जिसके लिए उन्हे नदी पर कर जाना पड़ता है । ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क की खराब स्थिति और पुल नहीं होने के कारण एंबुलेंस भी गांव तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में किसी मरीज की तबीयत बिगड़ने या आपात स्थिति में उसे अस्पताल पहुंचाना बड़ी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों के अनुसार समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण कई बार ग्रामीणों को गंभीर स्वास्थ समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
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चुनाव बहिष्कार के बाद मिला था सड़क निर्माण का आश्वासन
ग्रामीणों ने बताया कि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने सड़क की मांग को लेकर मतदान बहिष्कार का निर्णय लिया था। इसके बाद अधिकारियों की टीम गांव पहुंची और ग्रामीणों को सड़क निर्माण का आश्वासन दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने मतदान किया, लेकिन बाद में जब वे सड़क की मांग को लेकर फिर तहसीलदार के पास पहुंचे तो उन्हें निराशा हाथ लगी। ग्रामीणों के मुताबिक, तहसीलदार ने कहा कि चुनाव बहिष्कार के दौरान उन्हें ग्रामीणों को मतदान के लिए मनाने की जिम्मेदारी दी गई थी, जबकि सड़क निर्माण उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।तहसीलदार और एसडीएम को ज्ञापन देने से किया इनकार
धरना-प्रदर्शन के दौरान तहसीलदार और एसडीएम ज्ञापन लेने पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों ने उन्हें ज्ञापन देने से इनकार कर दिया। ग्रामीणों का कहना था कि वे पहले भी अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रख चुके हैं, लेकिन उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। इस बार ग्रामीण सीधे कलेक्टर से मुलाकात करने और अपनी मांग रखने पर अड़े रहे। उनका कहना है कि जब तक जिले के वरिष्ठ अधिकारी उनकी समस्या को गंभीरता से नहीं सुनेंगे, तब तक उन्हें समाधान की उम्मीद नहीं है।
जनप्रतिनिधियों पर भी ग्रामीणों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव में पहुंचते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। उनका दावा है कि विधायक और सांसद चुनाव जीतने के बाद अब तक गांव नहीं पहुंचे हैं। इसी नाराजगी के चलते प्रदर्शन के दौरान विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री के खिलाफ नारे लगाए गए। ग्रामीणों का कहना है कि गांव आज भी सड़क, पुल, आंगनबाड़ी भवन और स्वास्थ्य सुविधा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।मांग पूरी नहीं हुई तो नेशनल हाईवे पर चक्काजाम की चेतावनी
ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में वे राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्काजाम करेंगे। उनका कहना है कि सड़क और पुल का निर्माण केवल गांव की सुविधा की मांग नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ व्यवस्था और ग्रामीणों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।







