Punjab Assembly Election: आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासत गरमाने लगी है। सभी दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस बार एक अलग ही रणनीति के साथ मैदान में उतरती दिख रही है। अब तक शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के साथ दोबारा गठबंधन की चर्चाओं तक सीमित दिख रही बीजेपी, अब राज्य में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने में पूरी ताकत झोंक रही है। इसी रणनीति के तहत पार्टी दूसरे राजनीतिक दलों के असरदार चेहरों को अपने पाले में लाने की मुहिम तेज कर चुकी है। इस नई बिसात का असर हाल ही में देखने को मिला, जब आम आदमी पार्टी (आप) की पहली उम्मीदवार सूची सामने आने के तुरंत बाद उसके तीन बड़े चेहरों ने कमल का दामन थाम लिया। बीजेपी में शामिल होने वालों में पूर्व विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा, पूर्व मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा और अमृतसर उत्तर से विधायक रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह शामिल हैं। इन प्रमुख नेताओं के अचानक पाला बदलने से पंजाब के सियासी गलियारों में हलचल काफी बढ़ गई है।
क्या है बीजेपी का असली दांव?
बीजेपी की इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य उन इलाकों में अपनी पैठ बनाना है, जहाँ पारंपरिक रूप से उसका जनाधार कमजोर माना जाता रहा है। पार्टी को उम्मीद है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले इन नेताओं के आने से उसे सीधा चुनावी फायदा मिलेगा। कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन के बाद से ग्रामीण पंजाब में बीजेपी को जनसमर्थन जुटाने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में जनता के बीच खोया भरोसा वापस पाने के लिए बीजेपी को ऐसे स्थानीय चेहरों की जरूरत है, जो सीधे जमीन से जुड़े हों और जनता से सीधा संवाद कायम कर सकें।
अकाली दल के साथ मोलभाव की तैयारी
इस सियासी हलचल को शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन की बातचीत से भी जोड़कर देखा जा रहा है। साल 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों की पुरानी राहें अलग हो गई थीं, लेकिन अब 2027 के चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर दोनों के बीच नजदीकियों की सुगबुगाहट है। कृषि आंदोलन से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए बीजेपी हर संभव रास्ता तलाश रही है। अगर चुनाव से पहले बीजेपी अपने दम पर राज्य में कैडर और जनाधार मजबूत कर लेती है, तो टेबल पर बातचीत के दौरान वह अकाली दल के सामने ज्यादा सीटों पर दावेदारी ठोक सकेगी। दूसरी ओर, अकाली दल के लिए भी बीजेपी से दोबारा हाथ मिलाने से पहले अपने कोर वोट बैंक को साधे रखना एक बड़ी चुनौती होगा। फिलहाल बीजेपी पंजाब में दोहरे मोर्चे पर काम कर रही है—पहला, दूसरे दलों के बड़े चेहरों को शामिल कर अपना दायरा बढ़ाना और दूसरा, अकाली दल के साथ मोलभाव की स्थिति में खुद को मजबूत रखना। हालांकि, नए चेहरों के दम पर बीजेपी अपने जनाधार को वोट बैंक में कितना बदल पाती है, यह तो आने वाले चुनाव ही तय करेंगे।






