छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बागबाहरा थाना क्षेत्र से सामने आए चर्चित टोनही (डायन) प्रताड़ना मामले में आरोपियों की मुश्किलें अब और बढ़ गई हैं। न्यायालय के आदेश पर दर्ज एफआईआर के बाद गिरफ्तारी की तलवार लटकते देख आरोपियों ने राहत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, महासमुंद जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 21 आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका पूरी तरह से निरस्त कर दी है। पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब न्यायालय के कड़े रुख के बाद बागबाहरा पुलिस ने 23 आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
21 अर्जियों को कोर्ट ने किया खारिज
गिरफ्तारी से बचने के लिए इनमें से 21 आरोपियों ने बीते 22 जुलाई को जिला एवं सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी दाखिल की थी। मामले पर 29 जुलाई को पीड़ित और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड खंगालने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद 31 जुलाई को कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए सभी 21 अर्जियों को खारिज कर दिया। जमानत याचिका का विरोध करते हुए पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता शिवा आर्तत्राण पवार ने अदालत के समक्ष बेहद ठोस और गंभीर तथ्य पेश किए।
अधिवक्ता की मुख्य दलीलें:
आपराधिक पृष्ठभूमि: आरोपी पक्ष के कई लोगों का पहले से ही क्रिमिनल रिकॉर्ड रहा है और वे जेल की हवा भी खा चुके हैं।
तथ्य छिपाना: जमानत पाने के लिए आरोपियों ने अदालत से कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील जानकारियां छिपाने की कोशिश की।
टोनही बताकर किया प्रताड़ित
अदालत ने पीड़ित पक्ष की इन दलीलों और मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए आरोपियों को किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। यह पूरा विवाद बागबाहरा का है, जहाँ एक पीड़िता और उसके परिवार को कथित रूप से 'टोनही' बताकर प्रताड़ित किया जा रहा था। पीड़िता का आरोप है कि उन्हें लगातार गाली-गलौज, जान से मारने की धमकियों और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा था।
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आरोपियों की गिरफ्तारी की संभावना बढ़ी
पुलिस प्रशासन द्वारा त्वरित कार्रवाई न होने पर पीड़िता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के कड़े निर्देश पर 24 जुलाई को बागबाहरा पुलिस ने 23 नामजद लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज किया। बागबाहरा पुलिस ने इस मामले में छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब पुलिस द्वारा आरोपियों की गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है।