Arang News: बीते दो महीनों से लगातार जारी बारिश और बादलों के डेरे ने इस बार धान की खेती की गणित बिगाड़ दी है। धूप न खिलने और खेतों में लगातार नमी बने रहने से फसलों पर तरह-तरह के रोगों और कीड़ों का हमला शुरू हो गया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अपनी मेहनत को डूबने से बचाने के लिए किसान खेतों से उखड़े हुए बीमार पौधे लेकर सीधे कीटनाशक की दुकानों पर पहुँच रहे हैं।
धूप की कमी और नमी बनी आफत
स्थानीय किसानों का कहना है कि लंबे समय तक धूप न मिलने और हवा में नमी रहने से कीट-पतंगों को पनपने का पूरा मौका मिल गया है। इस समय खेतों में पत्तियों का रंग बदलने लगा है और जगह-जगह कीड़ों का असर साफ देखा जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, मौसम का यही मिजाज फसलों में फंगस और कीड़ों की आबादी तेजी से बढ़ाता है।
बालियां आने के वक्त तीन बड़ी बीमारियों की मार
इस समय धान की फसल अपने बेहद नाजुक मोड़ पर है, जहाँ पौधों में बालियां निकल रही हैं और दाने भरने शुरू हो रहे हैं। ऐसे में मुख्य रूप से तीन तरह की दिक्कतें सामने आ रही हैं:
- बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB): इससे पत्तियों के किनारे सूखने लगते हैं।
- भूरा माहो: यह छोटा सा कीड़ा पौधों का रस चूसकर उन्हें सुखा देता है।
- पेनिकल माइट: यह सीधा धान की बालियों और दानों की गुणवत्ता पर चोट करता है।
सही इलाज की आस में दुकान-दुकान भटकते किसान
गाँव-देहात के किसान अब अंदाजे से दवा डालने के बजाय एक नया तरीका अपना रहे हैं। वे प्रभावित फसल का पौधा उखाड़कर दुकानदार को दिखाते हैं ताकि बीमारी की सही पहचान हो सके। किसानों का मानना है कि इससे न सिर्फ बिना वजह के खर्च से बचा जा सकेगा, बल्कि सही समय पर सही दवा छिड़ककर फसल भी बचाई जा सकेगी।लागत बढ़ी, उत्पादन घटने का डर
बारिश की अनिश्चितता ने पहले ही किसानों की कमर तोड़ रखी थी, अब दवाइयों के छिड़काव और मजदूर के खर्च ने जेब पर आर्थिक बोझ और बढ़ा दिया है। यदि सही समय पर इन कीटों पर काबू नहीं पाया गया, तो दानों का भराव कमजोर रहेगा और पैदावार में सीधी गिरावट आएगी।
कृषि विभाग से मैदान में उतरने की गुहार
अपनी आँखों के सामने फसल बर्बाद होते देख किसानों ने शासन और कृषि विभाग के अधिकारियों से जल्द से जल्द खेतों का दौरा करने की माँग की है। किसानों का कहना है कि हर बीमारी की दवा अलग होती है, इसलिए विभाग का अमला खुद आकर खेतों का मुआयना करे और सही सलाह दे, ताकि उनका बेवजह पैसा खर्च न हो और पैदावार भी सुरक्षित रहे।रिपोर्ट - मोहनदास मानिकपुरी

