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Ancient Sculptures in Indravati Reserve(Image Source: Social Media)
Ancient Sculptures in Indravati Reserve(Image Source: Social Media)
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Indravati Tiger Reserve: माओवादी हिंसा खत्म, लेकिन बस्तर की सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां आज भी असुरक्षित

Indravati Tiger Reserve: छिंदक नागवंश और काकतीय काल की सैकड़ों प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं असुरक्षित पड़ी हैं। माओवादी हिंसा के कारण वर्षों तक इनका सर्वेक्षण नहीं हो सका। अब क्षेत्र में शांति और जंगल सफारी की तैयारियों के बीच इन ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा, सूचीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण की मांग उठ रही है।

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प्रकाशित: 31 Oct 2026, 02:05 PM · 4 मिनट पढ़ने का समय
बीजापुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Indravati Tiger Reserve: माओवादी हिंसा से उबरकर विकास की राह पर आगे बढ़ रहे बस्तर के सामने अब अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की चुनौती भी है। शासन-प्रशासन अगले पांच वर्षों में बस्तर को देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने का लक्ष्य लेकर काम कर रहा है, लेकिन इस विकास की दौड़ में यहां की पुरातात्विक संपदा की अनदेखी नहीं की जा सकती।
बीजापुर जिले के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में सैकड़ों प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं आज भी बिना किसी सुरक्षा के बिखरी पड़ी हैं। इन मूर्तियों का ऐतिहासिक महत्व काफी अधिक है, लेकिन अब तक इनके व्यवस्थित संरक्षण की दिशा में ठोस पहल नहीं हो सकी है।

2800 वर्ग किलोमीटर के जंगल में फैली ऐतिहासिक विरासत

बीजापुर जिले में करीब 2800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इंद्रावती टाइगर रिजर्व में छिंदक नागवंश और काकतीय राजवंश के दौर की सैकड़ों पाषाण प्रतिमाएं मौजूद हैं। इनमें कई प्रतिमाएं 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की बताई जाती हैं। महाराष्ट्र और तेलंगाना की सीमा तक फैले इस जंगल क्षेत्र में मौजूद इन प्रतिमाओं में कुछ ऐसी दुर्लभ कलाकृतियां भी शामिल हैं, जिनका उदाहरण छत्तीसगढ़ के दूसरे इलाकों में मिलना मुश्किल है। ये मूर्तियां बस्तर के प्राचीन इतिहास, कला और तत्कालीन सांस्कृतिक परंपराओं को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

माओवाद के कारण वर्षों तक नहीं हो सका सर्वेक्षण

इंद्रावती टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा तीन दशक से अधिक समय तक माओवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा। सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण पुरातत्व विभाग के अधिकारी और सर्वेक्षण दल इस इलाके तक नहीं पहुंच सके। कुछ समय पर पुरातात्विक सर्वेक्षण की योजनाएं जरूर बनीं, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसका नतीजा यह हुआ कि सैकड़ों प्रतिमाओं का अब तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं हो पाया। न इनकी व्यवस्थित सूची तैयार हुई और न ही इनका पूरा फोटो रिकॉर्ड बनाया जा सका। क्षेत्र में परिस्थितियां बदलने के बावजूद इन धरोहरों के संरक्षण को लेकर अपेक्षित सक्रियता नजर नहीं आ रही है।

जंगल सफारी शुरू होने से बढ़ सकती है चोरी की आशंका

इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जंगल सफारी शुरू करने की तैयारी की जा रही है। इससे बस्तर के इस वन क्षेत्र में पर्यटकों और बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, पर्यटन की संभावनाओं के साथ पुरातात्विक धरोहरों की सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। फिलहाल खुले जंगल और आसपास के इलाकों में मौजूद इन मूर्तियों की निगरानी के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में आशंका है कि बढ़ती आवाजाही का फायदा उठाकर ऐतिहासिक प्रतिमाओं की चोरी या अवैध तस्करी की घटनाएं हो सकती हैं।

गांवों से प्रतिमाएं गायब होने की खबरें, संरक्षण की मांग

दुर्भाग्य से अब तक इन धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए हैं। जागरूकता और जानकारी के अभाव में ये प्रतिमाएं असुरक्षित हालत में पड़ी हैं। कई गांवों से प्रतिमाओं की चोरी की खबरें भी आती रही हैं। कुछ ग्रामीण इन्हें घरों में रखकर पूजा करते हैं, जो आस्था का विषय है। लेकिन कई मामलों में बाहरी तस्कर इनका सौदा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुरातत्व एवं संस्कृति और वन विभाग को ग्राम सभाओं के समन्वय से सर्वेक्षण, सूचीकरण, फोटोग्राफी और वैज्ञानिक संरक्षण की कार्ययोजना बनाकर संरक्षण के लिए काम करना जरूरी हो गया है। तभी बस्तर की इस ऐतिहासिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाया जा सकेगा।
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