Plastic Waste Recycling: कचरे से संवरेंगी सड़कें, पॉलीथिन और प्लास्टिक का होगा शानदार इस्तेमाल, जानें क्या है पूरा प्लान
Plastic Waste Recycling: छत्तीसगढ़ में अब प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल सड़क निर्माण और डामरीकरण में किया जाएगा। नगरीय प्रशासन विभाग ने सभी नगर निगमों और नगर पालिकाओं को प्लास्टिक कचरे के संग्रहण, छंटाई और उपयोग के निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत सड़क निर्माण के टेंडर में भी प्लास्टिक के इस्तेमाल की शर्त शामिल होगी।
Plastic Waste Recycling: शहरों में कूड़ेदानों और कचरे के ढेरों की शोभा बिगाड़ने वाली पॉलीथिन और प्लास्टिक थैलियां अब हमारे पैरों के नीचे की राह को और मजबूत बनाएंगी। जी हां, छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक कचरे के पहाड़ों से निजात पाने के लिए एक बेहद अनोखा और असरदार कदम उठाया गया है। अब शहरों में बनने वाली
नई सड़कों और डामरीकरण के कामों में इसी बेकार प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस क्रांतिकारी पहल को अमलीजामा पहनाने के लिए नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने सूबे के सभी नगर निगमों और नगर पालिकाओं को सख्त और स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं।
कचरे से लेकर सड़क तक का सफर: ऐसे काम करेगा पूरा सिस्टम
रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कैरी बैग, चिप्स-बिस्कुट के रैपर, पैकेजिंग फिल्म और तमाम तरह की पॉलीथिन को अब घरों से ही करीने से जुटाया जाएगा। इसके लिए स्थानीय निकायों को मजबूत व्यवस्था बनाने को कहा गया है। घर-घर से इकट्ठा होने वाला यह कचरा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) केंद्रों तक पहुंचाया जाएगा। यहां इन प्लास्टिक कचरे की छंटाई होती है, इन्हें साफ किया जाता है, सुखाया जाता है और फिर इनकी ग्रेडिंग की जाती है। पूरी तरह तैयार होने के बाद इस ग्रेडेड प्लास्टिक को सड़क निर्माण करने वाले
ठेकेदारों को सौंप दिया जाएगा। इससे एक तीर से दो शिकार होंगे—शहरों में कचरे का संकट घटेगा और हमारी सड़कें पहले से ज्यादा टिकाऊ बनेंगी।
क्यों खास है प्लास्टिक वाली सड़क?
विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के तय मानकों के अनुसार डामर के कुल मिश्रण में बिटुमेन (कोलतार) के वजन का लगभग आठ प्रतिशत तक प्लास्टिक कचरा मिलाया जा सकता है। वैज्ञानिक तौर पर 'ड्राई प्रोसेस' से तैयार होने वाले इस खास मिश्रण की मजबूती और टिकाऊपन पारंपरिक डामर की सड़कों के बिल्कुल बराबर, बल्कि कई मामलों में उससे बेहतर पाई गई है। रिसर्च यह भी बताती है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल से सड़कों पर बारिश के पानी का असर (Water Damage) काफी कम हो जाता है, जिससे सड़कों की उम्र लंबी हो जाती है। केंद्र सरकार भी पहले ही देश भर में सड़क निर्माण में प्लास्टिक के उपयोग को अनिवार्य बनाने के निर्देश दे चुकी है। राज्य के नगरीय प्रशासन विभाग ने भी साफ कर दिया है कि इन निर्देशों के पालन में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों की जवाबदेही तय होगी।
ठेकेदारों के साथ होगा अनुबंध (MOU) और तय होंगी शर्तें
इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए स्थानीय निकायों को कड़े निर्देश दिए गए हैं:
रिकॉर्ड रखना होगा अनिवार्य: निकायों को अपने क्षेत्र में निकलने वाले प्लास्टिक कचरे और हर तीन महीने में तैयार होने वाले ग्रेडेड प्लास्टिक का पूरा लेखा-जोखा रखना होगा।
ठेकेदारों की सूची: लोक निर्माण विभाग (PWD), सड़क विकास निगम, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और नेशनल हाईवे के सड़क निर्माण ठेकेदारों की लिस्ट तैयार की जाएगी।
समझौता ज्ञापन (MOU): संबंधित विभागों से समन्वय बनाकर ठेकेदारों के साथ आधिकारिक एमओयू साइन किया जाएगा। इसमें प्लास्टिक की मात्रा, उसकी दर (रेट), गुणवत्ता (क्वालिटी), परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) और भुगतान की हर एक शर्त पहले ही स्पष्ट होगी ताकि भविष्य में किसी विवाद की गुंजाइश न रहे।
त्रैमासिक रिपोर्ट: हर तीन महीने में किस शहर में कितना प्लास्टिक तैयार हुआ और उसका कितना उपयोग हुआ, इसकी पूरी जानकारी राज्य स्तर पर भेजनी होगी।
अब टेंडर की शर्तों में भी जुड़ेगा प्लास्टिक का पन्ना
नगरीय निकायों द्वारा भविष्य में जब भी सड़कों के निर्माण या उनके नवीनीकरण (रिनोवेशन) के लिए टेंडर निकाले जाएंगे, तो उसमें प्लास्टिक के इस्तेमाल की शर्त को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाएगा। नियम के मुताबिक, निर्माण कार्य के लिए ठेकेदारों को ग्रेडेड प्लास्टिक केवल और केवल निकायों के एमआरएफ (MRF) केंद्रों से ही खरीदना होगा। इस एक फैसले से न केवल प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण का पक्का रास्ता खुलेगा, बल्कि प्रदेश में 'स्वच्छ भारत मिशन' को भी जबरदस्त मजबूती मिलेगी। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि अमले की मुस्तैदी से यह योजना जमीन पर कितनी तेजी से रंग लाती है।