Tuta Forest: फिल्म सिटी के लिए पेड़ों की कटाई पर गरमाई सियासत, ग्रामीणों का विरोध तेज, स्मृति ईरानी को लिखा पत्र
Tuta Forest: नवा रायपुर के तूता में चित्रोत्पला फिल्म सिटी के निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई का विरोध तेज हो गया है। माना-तूता जंगल संघर्ष समिति ने स्मृति ईरानी को पत्र भेजकर कटाई रोकने और परियोजना के लिए वैकल्पिक जमीन चुनने की मांग की है।
प्रकाशित: 30 Oct 2026, 01:16 PM· 5 मिनट पढ़ने का समय
रायपुर
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Tuta Forest: नवा रायपुर के तूता में प्रस्तावित 'चित्रोत्पला फिल्म सिटी' प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की कटाई का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा लगातार फूट रहा है। इसे रोकने के लिए 'माना-तूता जंगल संघर्ष समिति' ने आंदोलन को और आक्रामक बनाने की रणनीति तैयार कर ली है। विरोध का दायरा बढ़ाते हुए समिति ने इस पूरे संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए भाजपा की छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी को एक विस्तृत पत्र भी भेजा है।
विकास के खिलाफ नहीं, लेकिन जंगल उजाड़ना मंजूर नहीं"
नवा रायपुर सरपंच संघ के पूर्व अध्यक्ष सुजीत कुमार घिदौड़े ने इस मुद्दे पर दो-टूक बात कही है। उनका कहना है कि इलाके के लोग किसी भी कीमत पर पेड़ों की बलि देने को तैयार नहीं हैं।
"हमारा विरोध सरकार के किसी भी विकास कार्य या फिल्म सिटी प्रोजेक्ट के खिलाफ बिल्कुल नहीं है। लेकिन इसके लिए इस हरे-भरे जंगल को उजाड़ने के बजाय किसी अन्य वैकल्पिक और खाली जगह का चयन किया जाना चाहिए।" — सुजीत कुमार घिदौड़े, पूर्व अध्यक्ष, नवा रायपुर सरपंच संघ
ग्रामीणों का तर्क है कि आज के समय में जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है, तब सरकार को नए पेड़ लगाने और ऑक्सीजन बैंक तैयार करने पर जोर देना चाहिए। नवा रायपुर में सैकड़ों एकड़ जमीन ऐसी है जहाँ बिना एक भी पेड़ काटे इस तरह के प्रोजेक्ट्स आसानी से आ सकते हैं।
दावों और दागी जमीनी हकीकत का सच
माना-तूता जंगल संघर्ष समिति के सदस्य कृणाल सिन्हा ने प्रशासन और पर्यटन मंडल के दावों की पोल खोलते हुए तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि पिछले 9 महीनों से लगातार जंगल की निगरानी कर रही समिति अब इस मुद्दे को जन-आंदोलन का रूप देने जा रही है।
खोखले दावे: पर्यटन मंडल के प्रबंध संचालक (MD) द्वारा 1,100 पौधे लगाने का दावा किया जा रहा है, जबकि मौके पर की गई गिनती में सिर्फ 530 पौधे ही मिले और वे भी पूरी तरह सूख चुके हैं।
गांधी जयंती का पौधरोपण: बता दें कि इस साल 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) को टूरिज्म बोर्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों ने चित्रोत्पला फिल्म सिटी परिसर में करीब 1,000 पौधे लगाने का अभियान चलाया था। उस दौरान यह वादा किया गया था कि पर्यावरण के अनुकूल फिल्म सिटी बनेगी और पौधों की नियमित देखभाल होगी, लेकिन ज़मीन पर तस्वीरें इसके उलट नजर आ रही हैं।
स्मृति ईरानी को पत्र: प्रधानमंत्री की मुहिम का दिया हवाला
28 अक्टूबर को भेजे गए पत्र में समिति ने स्मृति ईरानी का ध्यान इस ओर खींचते हुए पेड़ों की कटाई पर फौरन रोक लगाने की मांग की है। पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि रायपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित माना-तूता का यह मानव-निर्मित जंगल दशकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है। बंजर और पथरीली जमीन पर खड़े किए गए इस जंगल ने आज एक मजबूत जैव विविधता विकसित कर ली है, जो राजधानी के लिए किसी 'प्राकृतिक सुरक्षा कवच' से कम नहीं है। समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय अभियान 'एक पेड़ मां के नाम' का जिक्र करते हुए कटाक्ष किया है कि एक तरफ देश में पौधे लगाने और पर्यावरण बचाने की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ वर्षों पुरानी इस हरित पट्टी को नेस्तनाबूद किया जा रहा है। समिति ने सुझाव दिया है कि फिल्म सिटी को दूसरी खाली जमीन पर शिफ्ट किया जाए और इस जंगल के बीच की खाली जमीन पर पर्यावरण शिक्षा केंद्र या लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं।
27 अक्टूबर से दोबारा शुरू हुई कटाई, थाने तक पहुँचा मामला
तूता में 27 अक्टूबर से एक बार फिर पेड़ों की कटाई का काम शुरू हो गया है। जैसे ही इसकी भनक ग्रामीणों को लगी, वे तुरंत मौके पर पहुंचे और पेड़ों से लिपटकर उन्हें बचाने की जिद पर अड़ गए। इस दौरान पुलिस के साथ उनकी तीखी झड़प भी हुई।
पुलिस ने मौके से 10 ग्रामीणों को हिरासत में ले लिया और माना थाने ले गई।
घटना की खबर मिलते ही कांग्रेस के शहर और ग्रामीण जिला अध्यक्ष समेत भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता व ग्रामीण थाने के बाहर जमा हो गए और जोरदार घेराव किया।
बढ़ते दबाव को देखते हुए पुलिस ने करीब एक घंटे बाद सभी ग्रामीणों को सुरक्षित छोड़ दिया।
ग्रामीणों का दर्द है कि यहाँ खड़े कई पेड़ 30 से 40 साल पुराने हैं, जिन्हें बड़ा होने में पीढ़ियों का वक्त लगा है। प्रस्तावित फिल्म सिटी के लिए लगभग 100 एकड़ में निर्माण होना है, जिससे हजारों पेड़ों के कटने का खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोग साफ कर चुके हैं कि वे विकास की रफ्तार रोकना नहीं चाहते, लेकिन अपनी आबोहवा और पर्यावरण की कीमत पर विनाश स्वीकार नहीं करेंगे।