Raipur Temples: पुरानी बस्ती के प्राचीन मंदिर, जहां हर मंदिर की अपनी अनोखी कहानी, जानिए इनका इतिहास
Raipur Temples: पुरानी बस्ती अपने प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मां महामाया मंदिर, मां दंतेश्वरी मंदिर, कंकाली मठ और शीतला माता मंदिर से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं और पूजा पद्धतियां इन्हें खास बनाती हैं।
प्रकाशित: 12 Oct 2026, 05:25 PM· 5 मिनट पढ़ने का समय
रायपुर
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Raipur Temples: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर अपनी तेजी से बदलती पहचान और विकास के साथ-साथ प्राचीन मंदिरों के लिए भी जानी जाती है। शहर का पुरानी बस्ती इलाका धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक परंपराओं का खास केंद्र है। यहां आसपास के क्षेत्रों में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे सदियों पुरानी मान्यताएं और लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। करीब दो किलोमीटर के दायरे में स्थित इन मंदिरों में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इन मंदिरों की खासियत केवल इनकी प्राचीनता नहीं है, बल्कि हर मंदिर की पूजा पद्धति, स्थापना से जुड़ी मान्यता और धार्मिक परंपराएं भी इन्हें अलग पहचान देती हैं। आइए जानते हैं रायपुर के चार ऐसे प्राचीन मंदिरों के बारे में, जिनकी कहानियां आज भी लोगों की आस्था का हिस्सा हैं।
1. मां महामाया मंदिर: राजा मोरध्वज से जुड़ी है स्थापना की मान्यता
पुरानी बस्ती स्थित मां महामाया मंदिर रायपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। इस मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर कई प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं। इसकी स्थापना की एक प्रसिद्ध लोककथा राजा मोरध्वज और उनकी रानी कुमुददेवी से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा मोरध्वज अपनी रानी के साथ नदी किनारे घूम रहे थे। इसी दौरान उन्हें पानी में एक काला पत्थर दिखाई दिया, जिसके ऊपर नाग फन फैलाए बैठा था। पत्थर को बाहर निकलवाने पर राजा को आकाशवाणी सुनाई देने की मान्यता प्रचलित है। इसके अनुसार, राजा को उस प्रतिमा को अपने कंधे पर उठाकर ले जाने के लिए कहा गया। राजा प्रतिमा को लेकर आगे बढ़े, लेकिन रास्ते में थककर उन्होंने उसे एक स्थान पर नीचे रख दिया। मान्यता है कि इसके बाद तमाम प्रयासों के बावजूद प्रतिमा वहां से नहीं हिली। अंततः उसी स्थान पर देवी की स्थापना कर दी गई। आज यह स्थान मां महामाया मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
2. मां दंतेश्वरी मंदिर: यादव समाज निभाता है पूजा की परंपरा
रायपुर के कुशालपुर चौक स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा परंपरा के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी लंबे समय से यादव समाज के परिवारों द्वारा निभाई जाती रही है। मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक लोककथा के अनुसार, पहले इस इलाके में घना जंगल हुआ करता था। यादव समाज के लोग यहां अपने मवेशियों को चराने के लिए आते थे। इसी दौरान गणेशिया बाई नाम की एक ग्वालिन ने देखा कि एक गाय एक पत्थर के ऊपर खड़ी होकर अपने थनों से दूध गिरा रही है। गणेशिया बाई ने इसकी जानकारी गांव के लोगों को दी। जांच करने पर उस पत्थर को देवी स्वरूप माना गया। इसके बाद वहां छोटा मंदिर बनाकर देवी की स्थापना की गई। स्थानीय परंपरा के अनुसार, तब से यादव समाज के परिवार ही मंदिर में पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभालते आ रहे हैं।
3. कंकाली मठ: साल में केवल दशहरे पर खुलते हैं पट
रायपुर के ब्राह्मणपारा क्षेत्र में स्थित कंकाली मठ अपनी प्राचीनता और अनोखी परंपरा के कारण विशेष पहचान रखता है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, इस मठ की स्थापना करीब 600 साल पहले नागा साधुओं ने की थी। कहा जाता है कि पुराने समय में इस इलाके में श्मशान हुआ करता था। कंकालों से जुड़ी मान्यताओं के कारण इस स्थान का नाम कंकाली पड़ा। बाद में देवी की प्रतिमा को पास में बने मंदिर में स्थापित किए जाने की बात कही जाती है। इस मठ की सबसे खास परंपरा यह है कि इसके पट सामान्य दिनों में बंद रहते हैं और दशहरे के दिन ही खोले जाते हैं। इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मठ के भीतर प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी रखे होने की जानकारी मिलती है, जिन्हें नागा साधुओं के समय का बताया जाता है। मठ के सामने स्थित तालाब का भी दशहरे के दिन विशेष महत्व रहता है। इस अवसर पर घरों में बोए गए जंवारा और ज्योत का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के चलते दशहरे के दौरान यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।
4. शीतला माता मंदिर: पिंड स्वरूप में होती है पूजा
पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना क्षेत्र के पास स्थित शीतला माता मंदिर भी रायपुर के प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर करीब 250 साल पुराना है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां देवी की पारंपरिक प्रतिमा के बजाय पत्थर के पिंड स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि यह पिंड जमीन से स्वयं प्रकट हुआ था। इसके बाद से श्रद्धालु इसी स्वरूप को माता का रूप मानकर पूजा करते आ रहे हैं। मंदिर में माता को ठंडे भोजन और मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है। एक और खास बात यह है कि लंबे समय से एक ही परिवार मंदिर की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभा रहा है। इस तरह मंदिर ने अपनी धार्मिक परंपरा को पीढ़ियों तक कायम रखा है।
रायपुर की धार्मिक विरासत को खास पहचान देते हैं ये मंदिर
रायपुर की पुरानी बस्ती के ये मंदिर शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मां महामाया मंदिर से जुड़ी लोककथा हो, मां दंतेश्वरी मंदिर की विशिष्ट पूजा परंपरा, कंकाली मठ का दशहरे पर खुलना या शीतला माता मंदिर में पिंड स्वरूप की आराधना—हर स्थान की अपनी अलग पहचान है। इन मंदिरों में प्रचलित मान्यताएं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं रायपुर के इतिहास और स्थानीय संस्कृति की झलक पेश करती हैं। यही वजह है कि आधुनिक शहर के बीच स्थित ये प्राचीन धार्मिक स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।