Saudi Houthi Conflict: सऊदी अरब को अमेरिका का साथ क्यों नहीं मिल रहा, जानिए 4 बड़ी वजहें
Saudi Houthi Conflict: सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच अमेरिका की सीमित भूमिका के पीछे बदलते रणनीतिक हित, घरेलू राजनीतिक दबाव, डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में अनिश्चितता और सैन्य कार्रवाई की चुनौतियां प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
प्रकाशित: 13 Oct 2026, 05:06 PM· 5 मिनट पढ़ने का समय
सऊदी अरब
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Saudi Houthi Conflict: सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दशकों पुराने रणनीतिक रिश्ते रहे हैं। दोनों देशों ने रक्षा, तेल और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर लंबे समय तक एक-दूसरे का साथ दिया है। इसके बावजूद, हूतियों के हमलों से निपटने के मामले में अमेरिका की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आखिर सऊदी अरब की मदद के लिए अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई करने से क्यों बच रहा है? आपके स्रोत में इसके पीछे चार प्रमुख वजहें बताई गई हैं—दोनों देशों के बदलते हित, अमेरिका की घरेलू राजनीति, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में अनिश्चितता और हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान की सीमाएं।
अमेरिका-सऊदी संबंधों का बदलता इतिहास
अमेरिका और सऊदी अरब के संबंधों की नींव तेल और सुरक्षा से जुड़े साझा हितों पर टिकी रही है। वर्ष 1945 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक किंग अब्दुलअज़ीज़ के बीच हुई मुलाकात को इस साझेदारी की अहम शुरुआत माना जाता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच हमेशा सहमति नहीं रही। इजरायल के मुद्दे पर मतभेद, 1973 का तेल प्रतिबंध और 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद पैदा हुआ तनाव रिश्तों को प्रभावित करता रहा। इसके बावजूद, क्षेत्रीय सुरक्षा के सवाल पर दोनों देश लंबे समय तक करीब रहे। अब हालात बदल रहे हैं। सऊदी अरब को अमेरिका की प्रतिबद्धता पर पहले जैसा भरोसा नहीं रह गया है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और दूसरे सहयोगी देशों के साथ वाशिंगटन के बदलते रुख ने भी इस चिंता को बढ़ाया है कि संकट के समय अमेरिका किस हद तक साथ देगा।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में सऊदी अरब के सामने बढ़ीं चुनौतियांअमेरिकी चुनाव और घरेलू दबाव
अमेरिका की विदेश नीति पर घरेलू राजनीति का भी असर पड़ता है। बढ़ती महंगाई और पेट्रोल समेत रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें अमेरिकी मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे हैं। ऐसे माहौल में मध्य पूर्व में एक और सैन्य अभियान शुरू करना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है। अमेरिका में घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ने से सऊदी अरब के तेल पर उसकी निर्भरता पहले जैसी नहीं रही। ऐसे में सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए बड़े सैन्य अभियान में शामिल होने का फैसला केवल रणनीतिक रिश्तों के आधार पर लेना आसान नहीं है। मध्य पूर्व मामलों की विशेषज्ञ जैस्मिन अल-गमाल के अनुसार, अमेरिकी जनता यह जानना चाहती है कि क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों से उसे क्या फायदा मिल रहा है।
सऊदी अरब की चिंता का एक बड़ा कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बदलता रुख भी बताया गया है। सऊदी नेतृत्व को उम्मीद थी कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के कारण संकट की स्थिति में अमेरिका सक्रिय मदद करेगा। लेकिन हूतियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वाशिंगटन की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से हूतियों पर हमला करने का आग्रह किया था। हालांकि, अमेरिका ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप के बजाय ओमान के माध्यम से हूतियों के साथ बातचीत का रास्ता चुना। इस बातचीत का उद्देश्य संघर्षविराम बनाए रखना और लाल सागर में अमेरिकी जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित रखना बताया गया। सऊदी अरब में अमेरिका के पूर्व राजदूत माइकल रैटनी ने भी अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता को लेकर चिंता जताई।
हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई आसान नहीं
अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप से बचने की एक वजह हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान की प्रभावशीलता भी है। यमन में सक्रिय इस समूह के खिलाफ कार्रवाई करना और उसके नियंत्रण वाले सभी इलाकों पर कब्जा करना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने 2024 में स्वीकार किया था कि हूतियों पर बमबारी के बावजूद उनके हमलों को पूरी तरह रोकना मुश्किल रहा है। इससे संकेत मिलता है कि केवल हवाई हमलों के जरिए समूह की सैन्य क्षमता को खत्म करना आसान नहीं है। अटलांटिक काउंसिल की विशेषज्ञ एलिसन माइनर के मुताबिक, हूतियों के नियंत्रण वाले सभी क्षेत्रों पर कब्जा करने के लक्ष्य की सफलता को लेकर संदेह है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने यह सवाल है कि क्या सऊदी अरब के मौजूदा सैन्य अभियान में शामिल होने से कोई ठोस नतीजा निकलेगा।
इजरायल के साथ रिश्ते भी बन रहे हैं अहम मुद्दा
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग के अलावा इजरायल के साथ संबंधों का सवाल भी महत्वपूर्ण है। ट्रंप प्रशासन चाहता रहा है कि सऊदी अरब अब्राहम समझौते के तहत इजरायल के साथ संबंध सामान्य करे। लेकिन सऊदी नेतृत्व इस दिशा में आगे बढ़ने को लेकर सतर्क रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल हूतियों के खिलाफ कार्रवाई में सऊदी अरब की मदद करने में रणनीतिक अवसर देख रहा है। हालांकि, सऊदी अरब के लिए इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा सहयोग करना राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। इससे अरब और व्यापक इस्लामी दुनिया में उसकी छवि प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। इस परिस्थिति में सऊदी अरब के सामने सुरक्षा जरूरतों और क्षेत्रीय राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।