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Lord Krishna performing Raas Leela with Gopis (Image Source: AI Generated)
Lord Krishna performing Raas Leela with Gopis (Image Source: AI Generated)
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Sharad Purnima: श्रीकृष्ण ने गोपियों संग क्यों रचाया महारास, जानें इसकी खास वजह

Sharad Purnima: शरद पूर्णिमा 2026 भगवान श्रीकृष्ण के महारास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी रात श्रीकृष्ण ने वृंदावन के वंशीवट में गोपियों के साथ महारास रचाया था। चंद्रमा की 16 कलाओं, अमृतमयी चांदनी और भगवान शिव के गोपी रूप धारण करने की कथा इस प्रसंग को विशेष बनाती है।

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प्रकाशित: 23 Oct 2026, 03:22 PM · 3 मिनट पढ़ने का समय
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Sharad Purnima: हिंदू धर्म-संस्कृति में शरद पूर्णिमा की रात का एक अलग ही दिव्य महत्त्व माना गया है। वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष शरद पूर्णिमा का पावन पर्व 25 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में यह मान्यता है कि इस खास रात धन की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी स्वयं पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हैं। यही वजह है कि यह दिन मां लक्ष्मी, भगवान श्रीकृष्ण और चंद्र देव की विशेष आराधना के लिए समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में शरद पूर्णिमा की इसी पावन रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की पवित्र भूमि पर गोपियों संग महारास रचाया था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान कृष्ण ने इस अलौकिक रास के लिए शरद पूर्णिमा की रात को ही क्यों चुना? इसके पीछे प्रकृति, चंद्रमा और अध्यात्म से जुड़े कई गूढ़ कारण छिपाए गए हैं।

16 कलाओं का पूर्ण चंद्रमा और अमृत वर्षा 

वर्ष भर में केवल शरद पूर्णिमा ही एक ऐसी रात होती है, जब चंद्रमा अपनी संपूर्ण 16 कलाओं से युक्त होता है। मान्यता है कि इस रात चंद्र देव की किरणों से पृथ्वी पर साक्षात अमृत की वर्षा होती है। इन शीतल किरणों के स्पर्श से पूरा वातावरण अलौकिक ऊर्जा से भर जाता है, जो मनुष्य के मन और शरीर दोनों को पवित्रता व मानसिक शांति प्रदान करता है। इसी दिव्य वातावरण को श्रीकृष्ण ने अपने प्रेम और भक्ति के रास के लिए चुना।

जब शिवजी को भी धारण करना पड़ा 'गोपी रूप' 

श्रीकृष्ण के महारास से जुड़ी एक अत्यंत सुंदर और रोचक पौराणिक कथा भी है। कहा जाता है कि जब भगवान कृष्ण ने महारास का आयोजन किया, तो देवी पार्वती को इसमें शामिल होने का निमंत्रण मिला। जब मां पार्वती ने महादेव से चलने का आग्रह किया, तो भगवान शिव भी रास देखने वृंदावन पहुंच गए। हालांकि, वहां पहुंचते ही उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण के अलावा महारास में किसी अन्य पुरुष का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। महारास की उस भक्तिमय धारा में सम्मिलित होने की तीव्र इच्छा के कारण भगवान शिव ने स्वयं एक गोपी का रूप धारण किया और रास का हिस्सा बने।

वंशीवट में गूंजी वह दिव्य तान 

शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में जब श्रीकृष्ण ने वृंदावन के वंशीवट पर अपनी बांसुरी उठाई, तो उसकी मधुर धुन से पूरा ब्रह्मांड समोहित हो उठा। कहते हैं कि बांसुरी की तान सुनते ही गोपियां अपना सब कुछ भूलकर कृष्ण की ओर खिंची चली आईं। श्रीकृष्ण की वंशी की वह धुन इतनी मोहक थी कि केवल धरती के जीव-जंतु ही नहीं, बल्कि स्वर्ग लोक से देवी-देवता भी इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने के लिए व्याकुल हो उठे थे।
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