Mental Health Awareness: दिनभर दफ्तर या कॉलेज में हंसते-खिलखिलाते चेहरे के साथ काम करना और रात को अकेलेपन में आंसुओं से सिहर उठना—क्या आप या आपका कोई करीबी इस दौर से गुज़र रहा है? अक्सर तनाव या मानसिक परेशानी महसूस होने पर हम संगीत सुनने, घूमने-फिरने या योगाभ्यास जैसी चीज़ों से इसे ठीक करने की कोशिश करते हैं। मानसिक सेहत को लेकर हमारे समाज में बरसों से यही धारणा बनी हुई है। हालांकि, बीते कुछ सालों में जागरूकता ज़रूर बढ़ी है, लेकिन यह समझना आज भी उतना ही ज़रूरी है कि शरीर की तरह हमारा मन भी बीमार पड़ सकता है।
खुद को कसूरवार न ठहराएं: डॉ. नंद कुमार (एम्स)
एम्स दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. नंद कुमार के अनुसार, जब आप किसी बात से परेशान हों और आगे का रास्ता न सूझ रहा हो, तो खुद को दोषी मानने के बजाय उन बाहरी परिस्थितियों को समझने की कोशिश करें जो आपको प्रभावित कर रही हैं। छोटी-से-छोटी बात भी आपके मानसिक संतुलन पर असर डाल सकती है। अगर सही समय पर इस ओर ध्यान न दिया जाए, तो यह स्थिति काफी गंभीर और जानलेवा रूप ले सकती है। आज देश का एक बड़ा युवा वर्ग अवसाद (डिप्रेशन) की चपेट में है। आए दिन सामने आने वाली आत्महत्या की घटनाएं सोचने पर मजबूर कर देती हैं। भारतीय मनोचिकित्सा सोसाइटी के आंकड़े बताते हैं कि देश में मानसिक विकारों के कुल मामलों में से लगभग 60 फीसदी मामले 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और किशोरों से जुड़े हैं। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और खुदकुशी की घटनाओं को रोकने के लिए गठित राष्ट्रीय कार्यबल (NTF) की रिपोर्ट ने भी एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है।
सफलता और काबिलियत नहीं रोकती मानसिक तनाव
देश के प्रतिष्ठित आईआईटी (IIT) संस्थानों में छात्रों द्वारा उठाए गए खौफनाक कदम या डॉक्टरों और सफल खिलाड़ियों की आत्महत्या की खबरें यह साफ़ करती हैं कि मानसिक बीमारी का किसी की असाधारण प्रतिभा, पढ़ाई या कामयाबी से कोई लेना-देना नहीं है। दुनिया के सबसे सफल ओलंपिक तैराक माइकल फेल्प्स हों या दिग्गज जिम्नास्ट सिमोन बाइल्स—दोनों ही बड़े मंचों पर अवसाद से अपनी लड़ाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं। सिमोन बाइल्स ने तो अपनी मानसिक सेहत को प्राथमिकता देते हुए 2021 टोक्यो ओलंपिक से अपना नाम तक वापस ले लिया था। डॉ. नंद कुमार बताते हैं कि 15 से 30 वर्ष के युवा इस समय सबसे अधिक दबाव में हैं। जब कोई छात्र आईआईटी जैसे संस्थान में प्रवेश पाता है, तो प्रतिस्पर्धा और खुद को सबसे आगे बनाए रखने की होड़ खत्म नहीं होती। वहां का माहौल इस तनाव को और बढ़ा देता है। दिमाग लगातार इसी एक सोच में लगा रहता है कि अपनी श्रेष्ठता कैसे बनाए रखी जाए। इस आपाधापी में परिवार, दोस्तों और समाज से जुड़ाव छूट जाता है।दो करोड़ का पैकेज ही सफलता नहीं है
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र नागपाल का मानना है कि आज के बच्चों में एक अवास्तविक और काल्पनिक दुनिया को पाने की होड़ मच गई है। वे हर सफलता बहुत कम समय में हासिल कर लेना चाहते हैं। किसी भी मुकाम तक पहुंचने के लिए मेहनत, समय और धैर्य की ज़रूरत होती है। समाज और परिवार भी सफलता का पैमाना '20 लाख या 2 करोड़ के पैकेज' को मान बैठे हैं। यही संकीर्ण सीख बच्चों को धीरे-धीरे अवसाद के अंधेरे में धकेल देती है।
क्या है मास्क डिप्रेशन ?
समाज में यह गलतफहमी है कि सफल लोग कभी मानसिक रूप से बीमार नहीं हो सकते। यही दबाव लोगों को 'मास्क डिप्रेशन' का शिकार बना देता है। इंसान बाहर से मुस्कुराता रहता है, सब कुछ ठीक होने का नाटक करता है ताकि कोई उसकी अंदरूनी तकलीफ को पहचान न सके। आमतौर पर अवसाद से पीड़ित व्यक्ति की छवि एक कोने में गुमसुम बैठे या सामाजिक जीवन से कटे हुए इंसान की मानी जाती है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। डिप्रेशन से जूझ रहा व्यक्ति भी बाहर से बेहद सक्रिय, अपनी नौकरी में अव्वल और सामाजिक रूप से घुलने-मिलने वाला दिख सकता है। इसलिए, मानसिक स्वास्थ्य को किसी तय ढर्रे पर मापने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना ही सही रास्ता है।इन लक्षणों से पहचानें मानसिक तनाव
- अधिकांश समय उदासी, निराशा या खालीपन महसूस होना।
- छोटी-छोटी बातों पर अचानक गुस्सा, चिड़चिड़ापन या भावुक हो जाना।
- नींद में अनिमितता (बहुत कम या बहुत ज़्यादा नींद आना) और भूख के पैटर्न में बदलाव।
- पसंदीदा कामों, शौक या पारिवारिक गतिविधियों से मन उचटना।
- शारीरिक थकान, ऊर्जा में कमी, बेवजह सिरदर्द या पेट में एसिडिटी रहना।
- किसी काम में ध्यान न लगना और निर्णय लेने में दिक्कत आना।
- खुद को दोषी ठहराना या मन में खुदकुशी के विचार आना।
बचाव और राहत के आसान कदम
- मानसिक सेहत को प्राथमिकता दें: अपनी नींद पूरी करें और परेशानी महसूस होने पर बेझिझक दूसरों की मदद मांगें।
- खुद के लिए समय निकालें: दिनचर्या में ध्यान (मेडिटेशन), हल्की कसरत, आराम और दोस्तों के साथ बातचीत के लिए वक्त ज़रूर निकालें।
- परफेक्शन का दबाव छोड़ें: यह स्वीकार करें कि दुनिया में कोई भी इंसान पूरी तरह 'परफेक्ट' नहीं होता। काम से ब्रेक लेना कोई कमज़ोरी नहीं है।
- स्वीकार्यता बढ़ाएं: अगर आप किसी मानसिक दबाव से गुज़र रहे हैं तो यह आपकी कोई व्यक्तिगत नाकामी या कमजोरी नहीं है। सही समय पर लक्षणों को पहचानकर और विशेषज्ञ की मदद लेकर इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

